154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
डा. डी. आर. भंडारकर ख्1, के अनुसार राजपूत गुर्जरों के वंशज है। गुर्जर विदेशी मूल के थे। अतः राजपूत विदेशियों के वंशज हैं।
जो ब्राह्मण राज्याभिषेक करते थे, राजपूतों की मूल उत्पत्ति से अनभिज्ञ न थे। यदि यह मान भी लिया जाए कि इस विषय में अनजान थे, तब भी वे इस सिद्धांत से अवश्य परिचित थे कि कलियुग में क्षत्रिय नहीं रहे।
यदि अपने पूर्ण निर्णय के आधार पर ब्राह्मण सिसोदिया अंश और शिवाजी के दावे को अस्वीकार कर देते तो कोई दोष न दे पाता। परंतु ब्राह्मण की फितरत है कि परंपरागत निर्णय से पलट जाएं। वह तो मौका पाकर रंग बदलते थे।
चौथी बात यह है कि उनके सिद्धांत और निर्णय ईसाई पादरियों की भांति बिक्री का सौदा होता है। गांघभट्ट और अन्य ब्राह्मणों को दी गई दक्षिणा के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि गांघभट्ट का निर्णय उचित था। राज्याभिषेक एवं दक्षिणा पर क्या कुछ व्यय किया गया। वैद्य महोदय के शब्दों को देखें ख्2, ःµ
प्रत्येक मंत्री को तीन लाख होन, एक हाथी, एक अश्व, वस्त्र तथा आभूषण उपहार स्वरूव दिए गए। गाघभट्ट को आयोजन संपन्न कराने की दक्षिणा एक लाख रुपया मिली। शिवाजी के अवसर के अनुकूल बहुत उपहार बांटे। सभासद के अनुसार राज्याभिषेक पर सारा खर्च एक करोड़ और 42 लाख होन अथवा 426 लाख रुपए खर्च हुए।
सभासद के अनुसार शिवाजी के राज्याभिषेक ख्3, के अवसर पर 50,000 वैदिक ब्राह्मण, हजारों की संख्या में योगी, संन्यासी आदि एकत्र हुए थे। इस सब को दुर्ग के नीचे भोजन दिया जाता था। तत्कालीन दस्तावेज से पता चलता है कि राज्याभिषेक के पूर्व शिवाजी को सोना तथा अन्य प्रत्येक धातु से तोला गया था। डच रिकार्ड [ पी. एस 3(1685) ] में आयोजन का सविस्तार विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि शिवाजी का वजन 160 पौंड था। उन्हें सोना, चांदी, तांबा, लोहा इत्यादि धातुओं, कपूर, नमक, शक्कर, घी, सुपारी, फलों आदि से तोला गया और उक्त सामग्री ब्राह्मणों में वितरित कर दी गई। उपहार स्वरूप अभिषेक के दूसरे दिन प्रत्येक ब्राह्मण को तीन से पांच रुपया तथा अन्यों को एक-एक रुपया दक्षिणा दी गई। स्त्रियों और बच्चों को क्रमशः दो-दो और एक-एक रुपया दक्षिणा दी गई। दक्षिणा पर कुल मिलाकर डेढ़ लाख होन ख्4, खर्च हुआ।
- सी. वी. वैद्य हिस्ट्री मेडीवियल इंडिया खंड 2, पृष्ठ 10 वैद्य इस मत से सहमत नहीं है और यह सिद्ध
करने का प्रयास करते हैं कि राजपूत विदेशी नहीं थे बल्कि मूल आर्य क्षत्रिय थे। जो कुछ श्री वैद्य
कहते हैं, वह विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता।
द फाउंडर आफ मराठा स्वरराज्य पृष्ठ 248-252
वैद्य के अनुसार यह संख्या 5000 होनी चाहिए लेकिन उन्होंने अपने समर्थन में कारण नहीं बताया है।
एक होन तीन रुपए के बराबर था।