शूद्र कौन थे - Page 18

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यह स्वीकार्य और स्वागत योग्य बात है कि शूद्रों के उद्भव का अध्ययन किया जाए फिर भी कोई व्यक्ति सवाल उठा सकता है कि इस विषय पर मेरा कितना अधिकार है। मुझे पहले ही यह चेतावनी दी गई है कि मैं भारतीय राजनीति, धर्म और भारतीय धर्म के इतिहास पर तो कुछ बोल सकता हूं परंतु इस विषय में मेरी क्षमता नहीं हैं मुझे यह बात समझ नहीं आती कि मेरे आलोचक मुझे यह चेतावनी कैसे दे सकते हैं। यदि एक विचारक और लेखक के रूप में मेरे किन्हीं अभूतपूर्व दावों पर यह कोई प्रतिरोध है तो यह अनावश्यक है। तब मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि मुझे भारतीय राजनीति पर भी कुछ कहने का अधिकार नहीं है। यदि यह चेतावनी इस आशय से दी गई है कि मैं संस्कृत भाषा का पारंगत नहीं हूं तो अपनी इस कमजोरी को मैं स्वीकार करता हूं। परंतु मेरी समझ में यह नहीं आता कि इस कारण मुझे इस विषय पर बोलने के लिए अयोग्य कैसे माना जा सकता है। संस्कृत में ऐसा कौन सा साहित्य है जो अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध नहीं है। तब संस्कृत भाषा के ज्ञान का अभाव मुझे इस विषय पर विवेचन करने से कैसे रोक सकता है। मैं यह कहने का साहस कर सकता हूं कि अंग्रेजी अनुवाद के रूप में उपलब्ध प्रासंगिक साहित्य के पन्द्रह वर्ष के अध्ययन से मेरे जैसा कोई भी व्यक्ति औसत दर्जे का ज्ञान अर्जित कर सकता है जिसको कोई कार्य संपन्न करने की क्षमता प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार इस विषय पर मेरी मान्यता है कि मेरा यह प्रयास कुछ इस प्रकार का है कि इस विषय को छूने में देवदूत तक घबरा जाते हैं उसकों मैं स्पर्श करूं। मैं यह मान कर संतोष करता हूं कि अनधिकारी का भी परम कर्तव्य है कि जब देवदूत सो जाएं या सत्य की उद्घोषणा से बचें वह अपना प्रयास जारी रखें। इस निषिद्ध क्षेत्र में मेरे प्रवेश का यही औचित्य है।

क्या यही बात इस ग्रंथ के विषय में भी उल्लेखनीय है? निस्संदेह मैं जो इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं वह मेरी जिज्ञासाओं और खोज का प्रतिफल है। इस पुस्तक में दो प्रश्नों का उत्तर पाने का प्रयास किया गया है। (1) शूद्र कौन थे? और (2) उन्हें भारतीय आर्य समुदाय का चतुर्थ वर्ण कैसे बनाया गया? संक्षेप में मेरा उत्तर इस प्रकार हैःµ

  1. शूद्र आर्यों के सूर्यवंशी समुदाय में से ही थे।

  2. एक समय था जब आर्य समुदाय ने केवल तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य

को ही मान्यता दी।

  1. शूद्रों का अलग से कोई वर्ण नहीं था वे भारतीय आर्य समुदाय के क्षत्रिय वर्ण

में आते थे।

  1. शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे और ब्राह्मणों

को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े।

  1. शूद्रों द्वारा किए गए उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होकर ब्राह्मणों ने फलस्वरूप

शूद्रों का उपनयन संस्कार संपन्न करना बंद कर दिया।