अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 171

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

कहा कि उन्होंने प्रमाणों की समीक्षा की है जिसके परिणामस्वरूप शिवाजी शूद्र ही ठहरते हैं। इसलिए राज्याभिषेक के अधिकारी नहीं है।

इस संबंध में गाघभट्ट ने केवल एक ही कलाबाजी नहीं खाई उन्होंन एक और विचित्र रंग दिखाया और घोषणा की कि वह शूद्र शिवाजी के स्थान पर बालाजी आवाजी का कायस्थ क्षत्रिय होने के नाते अभिषेक करने को तैयार हैं। गाघभट्ट इस पर भी टिका नहीं रहा और एक और पलटा खाया और घोषणा की कि शिवाजी क्षत्रिय हैं और वह उनका राज्याभिषेक करने को तैयार है। इतना ही नहीं उसने गाघभट्ट के नाम से एक लेख तैयार किया कि कायस्थ वर्णसंकर हैं। इस बहुरूपियेपन से क्या प्रकट होता है? गाघभट्ट राज्याभिषेक करना नहीं चाहता था पर उसे खरीद लिया गया था। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि उसने अपना निर्णय कि शिवाजी क्षत्रिय हैं, रिश्वत का धन लेकर दिया था ख्2, ।

अंत में शिवाजी के संबंध में निर्णय की एक बात और थी। ब्राह्मण कभी भी अपने पूर्व निर्णय पर टिके नहीं रहे। वे जब चाहें अपने अपने थूके को चाट लें। उन्होंने अपने निर्णय-शिवाजी क्षेत्रिय हैं, का कितने दिन तक पालन किया।?

शिवाजी ने अपने राज्याभिषेक के दिन अर्थात 6 जून 1674 से ‘‘राज्याभिषेक सम्वत’’ प्रारंभ किया। जब तक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी सिंहासनरूढ़ रहे, संवत का प्रचलन रोक दिया गया ख्1, । उन्होंने मुगल सम्राटों की भांति ‘‘फसली सन’’ का प्रयोग शुरू किया। इतना ही नहीं उन्होंने शिवाजी के उत्तराधिकारी के क्षत्रियत्व ख्2, को भी चुनौती

  1. ये संदेशवाहक का नाम नीलो येशाजी था। यह कायस्थ था। इससे पहले गाघभट्ट के लेने के लिए भेजे

गए तीन ब्राह्मण संदेशवाहकों पर यह शंका की गई कि बा्रह्मण होने के नाते वे, शिवाजी के राज्याभिषेक

के विरुद्ध थे और उन्होंने शिवाजी के साथ विश्वासघात किया। यह संभव है कि बालाजी ने ऐसा

महसूसकर दूसरी बार अपनी जाति वाले संदेशवाहक कामस्थ को भेजा।

  1. गाघभट्ट के बार-बार रंग बदलने के विषय में मैंने के. एस. ठाकरे की मराठी पुस्तिका ‘‘ग्राम्यांचा

इतिहास’’ देखा। ठाकरे ने अपनी पत्रिका में जो कहा है उस पर कितना विश्वास किया जा सकता है यह

कहना तो कठिन है, किंतु इस पर विश्वास किया जा सकता है कि गाघभट्ट कलाबाजियां खाता रहा।

उसकी इस उलट पुटल को जाने बिना प्रासंगिक तथ्यों को नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए प्रश्न

हैः क्या रायगढ़ आकर गाघभट्ट का विचार बदल गया? यदि हां, तो क्यों? इस परिवर्तन का कारण

एक अन्य ब्राह्मण लगाता है जिसका नाम मोरोपंत पिंगले था और जो शिवाजी का प्रधानमंत्री था। वह

शिवाजी को क्षत्रिय घोषित किए जाने का कट्टर विरोधी था। ऐसा लगता है कि जब ये दोनों ब्राह्मण

आपस में मिल कर बैठे तो गाघभट्ट ने पलटा खा लिया। जो मोरोपंत शिवाजी का कट्टर विरोधी था

वह उनके राजतिलक का कट्टर समर्थक कैसे बन गया। यह सत्य है कि गाघभट्ट ने एक कायस्थ

को राजा बनाने की घोषणा की, इसी से मोरोपंत ने पाला बदल लिया। बालाजी कायस्थ और कायस्थ

ब्राह्मणों के जानी दुश्मन है। इसलिए मोरोपंत ने सांप और बिच्छु में से बिच्छु को चुना।