अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 172

शूद्रों का पतन

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दी। शिवाजी ने अपने पुत्रों सांभाजी और राजाराम का उपनयन अपने जीवन काल में ही वैदिक रीति से ब्राह्मणों से करा दिया था। अतः ब्राह्मण उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। वे शिवाजी के पौत्र शाहूजी का भी कुछ अहित नहीं कर पाए क्योंकि तब तक सत्ता ब्राह्मणों के हाथों में नहीं आ पाई थी। शाहूजी द्वारा ब्राह्मण पेशवा का सत्ता सौंपने के साथ ही ब्राह्मणों के पंख खुल गए। इसका प्रमाण सुलभ नहीं है कि शाहूजी-द्वितीय के पुत्र रामजी राजे और साहू के अव्यस्क पुत्र जो पेशवा को संरक्षण में था उसका उपनयन पेशवा ख्3, के निर्देश पर पौराणिक विधि से अवश्य हुआ था या नहीं। परंतु इसके निश्चय प्रमाण हैं कि सन् 1777 ई. में दत्तक पुत्र बने शाहू-द्वितीय का पेशवा ख्3, के निर्देश पर यह पौराणिक रीति से उपनयन हुआ और वह शूद्र पेशवा बना। शाहू के पुत्र महाराजा प्रताप का जो 1808 ई. में शाहू द्वितीय का उत्तराधिकारी बना उनका उपनयन हुआ या नहीं, हुआ तो किसी रीति से हुआ इसका कोई पता नहीं चलता। हां एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि 1827 ई. में करवीर के शंकराचार्य ने सांगली के कायस्थों ख्4, के विषय में अपना निर्णय दियाः - ‘‘कलियुग में कोई क्षत्रिय नहीं रहे।’’।

उनके कार्यालय के दस्तावेज के अनुसार शिवाजी, शंभाजी और शाहूजी क्षत्रिय नहीं थे। परंतु कहा जाता है कि यह बात मूल निर्णय में न थी। सांगली के ब्राह्मण राजा ने इसे कालांतर में मुख्य निर्णय में क्षेपित करा दिया। कुछ भी हो वह शिवाजी के वंशज राजा प्रताप सिंह को खुली चुनौती थी। प्रताप सिंह ने सन् 1830 ई. में ब्राह्मणों का एक सम्मेलन आयोजित किया और विषय विचारार्थ प्रस्तुत किया। सम्मेलन ने प्रताप सिंह के पक्ष में निर्णय देकर उनको शूद्रत्व से बचा लिया।

शिवाजी की एक वंश शाखा से पराजित ब्राह्मणों ने कोल्हापुर की दूसरी शाखा पर आक्षेप शुरू कर दिए। कोल्हापुर के एक शासक बाबा साहेब महाराज के राज पुरोहित रघुनाथ शास्त्री ने सभी राजकीय संस्कार पौराणिक विधि से संपन्न कराना प्रारंभ कर दिया। उसे ऐसा करने से रोक दिया गया। बाबा साहेब की मृत्यु 1886 में हो गई थी। वर्ष 1886 से 1894 तक के सभी राजा अवयस्क थे तथा प्रशासन अंग्रेजी के हाथों में आ गया था। अतः ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिल पाता जिससे यह पता चल सके कि राज पुरोहित ने उनके संस्कार किस विधि से किए/कराए। सन् 1902 में शाहू महाराज ने महल के राज पुरोहित को निर्देश दिया कि वह सभी संस्कार वैदिक रीति से संपन्न करें। किन्तु पुरोहित अड़ गए कि कोल्हापुर के शासक क्षत्रिय न होकर शूद्र हैं और सभी संस्कार पौराणिक विधि से कराने पर बल दिया। इस संबंध में करवीर के शंकराचार्य

  1. सर देसाई मराठी रियासत-2 पृष्ठ 363 और वैद्य शिवाजी पृष्ठ 251

  2. राव बहादुर डोगरे द्वारा संपादित सिद्धांत विजय से उद्धत

  3. राव बहादुर डोगरे द्वारा संपादित सिद्धांत विजय की भूमिका पृष्ठ 6

  4. वही