अध्याय 10. शूद्रों का पतन - Page 173

158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विवाद के समय शंकराचार्य ने अपने शिष्य ब्राह्मणाल्कर को मठ के समस्त अधिकार सौंए दिए। प्रारंभ में तो गुरु शिष्य दोनों की महल के राज-पुरोहित से मिली भगत रही और वे महाराजा के विरोधी रहे। लेकिन कुछ समय उपरांत ही शिष्य ने महाराजा का पक्ष लिया और महाराजा को क्षत्रिय स्वीकार किया। इससे खिन्न होकर गुरु ने शिष्य का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। महाराजा ने अपना ही शंकराचार्य ख्1, नियुक्त किया। परंतु वह भी उनका विरोधी हो गया।

शिवाजी को क्षत्रिय माना गया था। अस्तु यह सम्मान व्यक्तिगत न होकर उनकी भावी पीढि़यों को भी मिल गया था। किसी को इसमें परिवर्तन का अधिकार नहीं था। शिवाजी के उत्तराधिकारी द्वारा कोई दुष्कर्म भी नहीं किया गया था, फिर भी ब्राह्मण उन्हें हीन शूद्र मानते थे। यह सब इस कारण हुआ कि ब्राह्मणों को छूट थी कि वे किसी भी हिंदू का वर्ण उलट पुलट कर दें। उनके पास कारीगरी थी कि वे शूद्र को क्षत्रिय और क्षत्रिय को शूद्र बना डालें। शिवाजी के मामले में यह सिद्ध होता है कि वर्ण निर्धारण में ब्राह्मणों को अनियंत्रित अधिकार प्राप्त हैं।

यह कथा ख्2, केवल बंबई प्रेसीडेंसी से उद्धत की गई है। परंतु निम्न सिद्धांत समस्त देश में प्रचलित हैं। यथाः

  1. उपनयन की ठेकेदारी केवल ब्राह्मणों की है। शिवाजी, प्रतापसिंह या कायस्थ, पांचाल या पालशे, कोई भी गैर- ब्राह्मण से उपनयन कराने का साहस न रखते थे। केवल एक बार कायस्थों ने संस्कार कराने का प्रस्ताव पारित किया था किन्तु वह मात्र प्रस्ताव ही रह गया।

  2. ब्राह्मण को यह अधिकार है कि वह किसी का उपनयन करे अथवा न करे। अथवा दूसरे शब्दों में एकमात्र ब्राह्मण ही इसका निर्णायक है कि अमुक जाति उपनयन की पात्र है अथवा नहीं।

  3. उपनयन के संबंध में ब्राह्मण की सहमति के लिए ईमानदारी आवश्यक नहीं। वह मुट्ठी गर्म करके भी कराया जा सकता है। शिवाजी ने गाघभट्ट की झोली में भारी धन देकर अपना उपनयन कराया था।

  4. ब्राह्मण द्वारा उपनयन से इन्कार का आधार वैधानिक या धार्मिक होना आवश्यक नहीं। वह राजनीतिक विद्वेष या कारण भी हो सकता है। ब्राह्मणों ने कायस्थों का उपनयन राजनैतिक प्रतिद्धंद्धिता के कारण बंद कर दिया था।

  5. वह डाक्टर कुर्तकोटि के नाम से जाना जाता है।

  6. विवरण हेतु के. एस. ठाकरे के मराठी प्रकाशन 1919 में प्रकाशित ‘‘ग्राम्यांचा इतिहास’’ देखें।