संधि की कथा
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यद्यपि कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है तथापि यह स्वाभाविक है कि ब्राह्मणों के साथ संघर्ष में यह वंश समस्त शूद्र वंश एक पक्ष था। प्राचीन काल में जब संघर्ष हुआ सभ्यता और व्यवहार प्रारंभिक अवस्था में थे तथा एक व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध व्यक्तिगत नहीं माना जाता था। इसका परिणाम समस्त जाति या वंश को भोगना पड़ता था। अतः यह पूर्णतः स्वाभाविक है कि ब्राह्मणों ने अपनी शत्रुता उत्पीड़क राजाओं तक ही सीमित न रखकर संपूर्ण शूद्र जाति का उपनयन बंद कर दिया।
II
क्या उत्तेजना इतनी प्रबल हो चुकी थी, यह निर्विवाद है। दोनों ओर पारा चढ़ा था। दो पक्षों में द्वेष भाव चरम सीमा पर था। स्थिति विस्फोटक थी।
दूसरी ओर ब्राह्मणों द्वारा समाज में श्रेष्ठता तथा विशेष अधिकार प्राप्त करने का दावा भी असह्य हो गया था।
ब्राह्मणों के दावों की लंबी सूची ख्1, का अवलोकन करें। इसके अनुसार ब्राह्मणों के दावे इस प्रकार हैंःµ
ब्राह्मण को जन्म के आधार पर सभी वर्णों का गुरु माना जाए।
अन्य वर्णों के कर्तव्य, आचरण तथा जीविका के स्रोत निर्धारण करने का अधिकार
केवल ब्राह्मण को है। सभी वर्ण आंख मूंद कर इसका पालन करें। राजा ब्राह्मण के
निर्देश से शासन चलाए।
- ब्राह्मण राजा के अधीन नहीं है। ब्राह्मण के अतिरिक्त राजा सभी वर्णों का शासक
होगा।
- ब्राह्मण इन दंडों से मुक्त है - (1) चाबुक, (2) हथकड़ी-बेड़ी, (3) आर्थिक
दंड, (4) देश निकाला, (5) भत्सर्ना, (6) सामाजिक बहिष्कार। 5. श्रोत्रिया ब्राह्मण (वेद-विद ब्राह्मण) कर मुक्त है।
- यदि गड़ा हुआ धन ब्राह्मण को मिले तो वह उसका संपूर्ण अधिकारी है। यदि राजा
को मिले तो वह आधा भाग ब्राह्मण को दे।
- निस्संतान मरने वाले ब्राह्मण की संपत्ति राजकोष में न जमाकर श्रोत्रियों और
ब्राह्मणों में वितरित कर दी जाए।
यदि राजा को श्रोत्रिय या ब्राह्मण रास्ते में मिले तो राजा उनके लिए मार्ग छोड़ दे।
सबसे पहले ब्राह्मण का अभिवादन किया जाए।
ब्राह्मण पवित्र है। उसे हत्या के अपराध में भी प्राण दंड नहीं दिया जाए।
काणे धर्म शास्त्र खंड 2, पृष्ठ 138-153