4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
- उपनयन संस्कार से वंचित होने पर शूद्र जो क्षत्रिय थे उनका सामाजिक ”ास
हो गया। उनका दर्जा वैश्यों के नीचे हो गया और वे चौथे वर्ण में गिने गए।
अपने इन निष्कर्षों के आधार पर मुझे विद्वानों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है। ये निष्कर्ष न केवल मौलिक हैं वरन् उन मान्यताओं के उग्र विरोध में है जो आजकल विद्यमान हैं। इन निष्कर्षों को स्वीकार किया जाता है या नहीं, यह उन लोगों की मनोवृत्ति पर निर्भर है जो इस मुद्दे पर अपने अधिकार का दावा करते हैं। वास्तव में यदि कोई व्यक्ति विशेष अवधारणा से जुड़ा है तो मेरे मत को अस्वीकार करेगा। मै। उनकी प्रतिक्रियाओं की परवाह नहीं करता क्योंकि वे तो विरोध करेंगे ही, जिनसे विरोध के सिवाय कोई उम्मीद नहीं है परंतु जो ईमानदार समालोचक हैं कि कितने ही फूंक-फूंक कर कदम धरने वाले क्यों न हों, चाहे वे रूढि़वादी भी हो यदि उनकी नीयत साफ है और सच् चाई से नजर नहीं चुराना चाहते और वे भी मेरे विचार से यदि सहमत नहीं तो मैं इससे निराशा नहीं होता। मेरी यह आकांक्षा ध्वस्त भी हो सकती है, पर मुझे विश्वास है कि मेरे आलोचकों को यह स्वीकार करना होगा कि इस ग्रंथ में बहुत कुछ नया है और इसने अभिनव दृष्टि प्रदान की है।
विद्वानों के अतिरिक्त हिंदू समाज की प्रतिक्रिया का अंदाजा भी रोचक है। आज का हिंदू समाज पांच निश्चित वर्गों में बंटा हुआ है। हिंदुओं का एक वर्ग है जो रूढि़वाद के दलदल में फंसा पड़ा है और जो यह स्वीकार नहीं करते कि हिंदू समाज की व्यवस्था मेंं कुछ विकार है भी। उनकी नजर में तो सुधार की बात करना तक ईश्वर की निंदा है। हिंदुओं का दूसरा वर्ग है जो आर्य समाज कहलता है। उनकी दृष्टि में सिर्फ वेद ही परम सत्य है। वे रूढि़वादियों से उतना ही विभेद मानते हैं जितना कि उन सब बातों को तिस्कृत करने में जो वेदों में नहीं है। उनका मूल मंत्र वेदों की पुनःप्रतिष्ठा है।
एक तीसरा व ऐसा वर्ग है जिसके विचार से पूरा हिंदू समाज की गलत व्यवस्था पर आधारित है, परंतु वे सोचते हैं कि इस पर प्रहार करना आवश्यक नहीं है। उनका तर्क है कि उसे कानूनी मान्यता ही नहीं है आज यह व्यवस्था यदि भस्मीभूत भी नहीं है तो अंतिम सांसें जरूर गिन रही है। हिंदूओं का चतुर्थ वर्ग राजनीतिक मानसिकता में लिप्त है। वे ऐसे सवालों से कन्नी काटते हैं। उनकी दृष्टि में सामाजिक सुधार की अपेक्षा स्वराज का अधिक महत्व है। हिंदुओं का पांचवां वर्ग बुद्धिजीवियों का है और जिनकी दृष्टि में समाज सुधार का सर्वोच्च स्थान है स्वराज से भी बढ़कर।
हिंदुओं का जो वर्ग दूसरी श्रेणी में गिना जाता है उनके लिए संभवतया ऐसी रचना अनावश्यक हो जिससे में सहमत नहीं। एक प्रकार से वे सही हैं जब यह कहते हैं कि ब्रिटिश भारत में प्रचलित कानून हिंदू समाज में व्याप्त व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता। यह ठीक है कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के अनुसार हिंदुओं के लिए किसी