अध्याय 11. संधि की कथा - Page 180

संधि की कथा

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ऋग्वेद की अनुक्रमणिका के अनुसार निम्नांकित स्रोत मंत्रों से स्रष्टा अधोलिखित सूर्यवंशी राजागण ख्1, थे।

‘ऋग्वेद 6.15ः वातहव्य (अथवा भारद्वाज) 10.9ः सिंधुदीप पुत्र अम्बरीष (अथवा त्षस्त्री के पुत्र त्रिशिरस)_ 10.75 प्रियमेध के पुत्र सिंधुक्षित_ 10.133ः पैजवन के पुत्र सुदास_ 10.134ः युवनाश्व का पुत्र मान्धात्री_ 10.179ः उशीनगर के पुत्र शिवि_ काशिराज दिवोदास के पुत्र प्रतार्दन तथा रोहिदाश्व का पुत्र वसुमानस_ तथा 10.148 पृथु वेन।

मत्स्यपुराण ख्2, के अनुसार ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकारों के नामों की सूची निम्नांकित हैः भृगु, काश्य प्राचेतस, दधीचि, आत्मवत, और्ब, जमदग्नि, कृप, शारद्वत्त अरष्टि सेन, युद्धजित, वातहव्य, सुवर्चस, वेन, पृथु, दिवोदास, ब्राह्मणस्व, गृत्स, सैनिक, ये 19 भृगु हैं, जिन्होंने मंत्ररचे। अंगीरस, बेधस, भारद्वाज, भालनंदन, रितसब्ध, गर्ग, सिसि, संकृति, गुरूधीर, मांधात्री, अम्बरीष, युवनाश्व, पुरुकुत्स, प्रद्युम्न, श्रावनाश्व, अजामेघ हर्यश्व, तक्षप, कवि, प्रिशदश्व, वामदेव, अजीत, वृहदक्या, दीर्घातमस, काक्षीव, (ये 33 प्रमुख अंगिरस हैं। ये सभी मंत्र रचनाकार थे। अब काश्यपों को लें, गाधि पुत्र विश्वामित्र, देवराज, बल मधुछंद ऋषभ, अध्नमाशर्नि, लोहित, आष्टक, भृतकिल, वेदश्रवा, देवव्रत, पूर्णश्व, धनंजय, गौरवशाली मिथिला शालकायन ये सब 13 प्रमुख कौशिक हैं। क्षत्रियों में तीन प्रमुख मंत्र सृष्टा है - मनु वैवस्वत, इड़ा और पुरुरवा, वैश्यों में भालन्द वंद्य और सांस्कीर्ति प्रमुख तीन मंत्र सृष्टा हुए है। इस प्रकार ब्राह्मणों व क्षत्रियों और वैश्यों के 91 व्यक्तियों ने वैदिक मंत्रों की रचना की है।

यह सूची केवल क्षत्रियों के बहुत से नामों की ही नहीं है, बल्कि अनेक ऐसे क्षत्रियों के नाम भी हैं जिनका ब्राह्मणों से संघर्ष हुआ। वेद मंत्रों की रचनाओं में क्षत्रियों की भूमिका प्रमुख थी। अत्यंत विख्यात गायत्री मंत्र की रचना विश्वामित्र ने की जो एक क्षत्रिय थे। यदि उनमें यह क्षमता न होती तो क्षत्रियों को ब्राह्मणों की चुनौती का सामना करना संभव होता।

ब्राह्मणों के प्रपंचों से क्षत्रियों के विद्याध्ययन और शूरता के आधार पर प्राप्त गौरव को आघात पहुंचता था। अतः उन्होंने ब्राह्मणों की चुनौती बहुत शूरवीरता से स्वीकार की और इस चुनौती का उत्तर दमन से दिया। उन्होंने ब्राह्मणों की बुरी गत बनाई। वेन ने देवताओं के स्थान पर अपनी पूजा कराने के लिए ब्राह्मणों को बाध्य किया। पुरुरवा ने उनकी धन संपत्ति लूट ली। नहुष ने ब्राह्मणों को रथ में जोत कर नगर में घुमाया। निमि ने अपने पुरोहित को अपने कुल परंपरागत संस्कार कराने से रोक दिया। सुदास ने इस सबसे आगे जाकर अपने पूर्व के कुल पुरोहित वशिष्ठ के पुत्र शक्ति को जीवित जला डाला। इस प्रकार शूद्रों से बदला लेने के लिए ब्राह्मणों के मन मानस में निश्चित रूप से इससे बढ़कर और कोई कारण हो ही नहीं सकता था।

  1. म्यूर खंड 1 पृ. 268

  2. म्यूर खंड 1 पृ. 268