अध्याय 11. संधि की कथा - Page 181

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

III

ब्राह्मणों और शूद्रों के मध्य सुलह के कुछ साक्ष्य मिलते हैं। इससे पहले कि मैं इन साक्ष्यों पर अपना मत स्थापित करूं मैं साक्ष्यों की जानकारी देना परम आवश्यक समझता हूं। संधि की कथाएं महाभारत और पुराणों में बिखरी पड़ी हैं।

पहली कथा दो कबीलों, भरत जिसमें विश्वामित्र था तथा त्रित्सुओं जिसमें वशिष्ठ थे, के बीच सुलह की है। भरत त्रित्सुओं के शत्रु थे। यह ऋग्वेद ख्1, (3.53,24) से स्पष्ट है - ‘‘हे इंद्र, भरत पुत्र वशिष्ठों को आने से रोको।

महाभारत ख्2, के आदि पर्व में सुलह की कथा इस प्रकार हैः-

‘‘और उनके शत्रुओं ने भरतों को मारा। पांचाल ने चतुरगिणी सेना द्वारा आक्रमण कर उन्हें पराजित किया। राजा संवरण अपनी पत्नियों, पुत्रों, मंत्रियों और मित्रों के साथ भाग खड़ा हुआ और सिंधु के जंगलों में जा छिपा। भरत वहां एक हजार साल तक रहे। वशिष्ठ ऋषि के आने पर भरतों ने उनका अभिवादन किया। महर्षि के आसन ग्रहण करने पर राजा ने सादर निवेदन किया -‘‘आप हमारे पुरोहित बनें।’’ तदुपरांत हमें हमारे राज्य की पुनः प्राप्ति में सहायता दें।’’ वशिष्ठ ने पुरु को समस्त क्षत्रियों की प्रभुता सौंप दी। उसने भरतों के खोए हुए राज्य पर तो अधिकार किया ही अन्य सभी राजाओं को भी अपने अधीन किया।’’

दूसरी कथा, भृगुओं और क्षत्रिय राजा कृतवीर्य के मध्य विग्रह संधि की है। महाभारत ख्3, के आदि पर्व की कथा के अनुसारः-

‘‘कृतवीर्य नाम का एक राजा था। भृगु ने उसका यज्ञ कराया और राजा से गौएं और धन प्राप्त किया। राजा की मृत्यु के उपरांत उनके कुछ धनी उत्तराधिकारी भृगुओं ने ब्राह्मणों को धन दे दिया और कुछ ने धन जमीन में गाढ़ दिया था। कुछ ने राजपुत्रों को वापस दे दिया। एक क्षत्रिय ने एक भृगु का घर खोद कर जमीन में दबा धन खोज निकाला। सारे क्षत्रियों ने इस खजाने को देखा और क्रोध में आकर सब भृगओं का वध कर दिया। उन्होंने गर्भस्थ शिशुओं तक पर तरह नहीं खाया। विधवाएं हिमालय की ओर भाग गई। उनमें से एक ने अपने गर्भ को बचा लिया। एक ब्राह्मण गुप्तचर से यह समाचार प्राप्त कर वे उसे मारने गए किंतु उस गर्भस्थ शिशु के तेज से जंगलों में अंधे होकर भटकने लगे। हार कर उन्होंनें नेत्रों की ज्योति फिर से पाने के लिए शिशु की स्तुति की। शिशु की मां के परामर्श पर क्षत्रियों ने नवजात शिशु और्व की स्तुति की और फिर से नयनों की ज्योति पाई। और्य वेद वेदांग में पारंगत बताया गया है। भृगुओं

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 354

  2. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 361

  3. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 448-449