अध्याय 11. संधि की कथा - Page 182

संधि की कथा

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के वध का बदला लेने के लिए और्व कठिन तप करने लगा। देवता, असुर और मानव चिंतित हो उठे। और्व के पूर्वजों ने जाकर उसे समझाया। ‘‘वे क्षत्रियों से बदला लेना नहीं चाहते। वे स्वयं वृद्ध हो गए थे और मरना चाहते थे। आत्मघात से बचने के लिए उन्होंने जमीन में धन छिपा कर क्षत्रियों को भड़काया था। अस्तु हे, पुत्र! तुम अपने क्रोध से क्षत्रियों और सातों द्वीपों को नष्ट न करो। और्व ने उत्तर दिया - यदि मेरा क्रोध दूसरों पर न उतरा तो स्वयं मुझे ही नष्ट कर देगा।’’ पितरों ने उसे अपना क्रोध समुद्र में बहाने का परामर्श दिया। समुद्र में जाते ही क्रोध दावानल बन गया, जो अग्नि उगलता है और जल को पीता है।’’

तीसरी कथा हैहय नरेश कृतवीर्य के पुत्र सहस्त्रबाहु अर्जुन और ब्राह्मण परशुराम की है। यह महाभारत ख्1, के वन पर्व में निम्न प्रकार हैः

‘‘बताया जाता है कि हैहय राजा कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन के एक सहस्त्र हाथ थे। उसने दत्तात्रेय से वायु गति का एक स्वर्ण रथ प्राप्त कर लिया और देव, यक्ष, ऋषि आदि सब का दमन किया। देवता और ऋषि विष्णु के पास गए। वे सब और इंद्र अर्जुन से अपमानित हो चुके थे। अतः उन्होंने उसके वध की योजना बनाई। कान्यकुब्ज के राजा गाधि की पुत्री सत्यावती का विवाह ऋषि रिचिक से हुआ और जमदग्नि का जन्म हुआ। ऋषि के पांच पुत्र थे जिनमें परशुराम सबसे छोटे थैं परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा से अपनी मां का वध कर दिया और अपने पिता से दीर्घायु और अजेय होने पर वर प्राप्त किया। बाद में परशुराम के आग्रह पर जमदन्नि ने रेणुका को जीवित कर दिया।

एक दिन सहस्त्रबाहु अर्जुन जमदग्नि के आश्रम में आया। ऋषि पत्नी ने उसका स्वागत किया। वह लौटते वक्त आश्रम के फलदायी वृक्षों को गिरा गया और ऋषि की गाय और बछड़े को ले गया।

परशुराम को बहुत क्रोध आया। उन्होंने उसके सहस्त्र हाथ काट कर उसे मार डाला। अर्जन के पुत्रों ने परशुराम की उपस्थिति में जमदग्नि को मार डाला। परशुराम का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का अस्तित्व समाप्त करने का प्रण लिया। वे अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर निकल पड़े। उन्होंने अर्जुन के पुत्रों, पौत्रों सहित सैकड़ों हैहयों को मार दिया। पृथ्वी रक्त से लाल हो उठी। क्रूरता के साथ किए गए क्षत्रियोंन्मूलन से उनका मन दुख से व्याकुल हो गया। अतः वे मन को शांत करने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए वन में चले गए। कुछ सहस्त्र वर्ष बीत जाने पर विश्वामित्र के पौत्र और रैभ्य के पुत्र परावसु ने जनकपुर में एक भरी सभा में ताना देते हुए कहाः क्या ययाति की इस समुद्र नगरी में एकत्र प्रतार्दन आदि पुन्यात्मां क्षत्रिय नहीं हैं।’’

  1. म्यूर खंड 1, पृ. 449-454