संधि की कथा
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वशिष्ठ ने कहा - जो कुछ हुआ है वह दैविक शक्ति से हुआ है। इसलिए हे राजन अब जाकर अपना राज संभालो। किन्तु ब्राह्मण निंदा न करना। राजा ने वचन दिया - ‘‘मैं ब्राह्मणों को किसी भी तरह हीन न समझूंगा। मैं आपका आदेश शिरोधार्य कर उन्हें पूरी तरह आदर दूंगा। अब आप मेरी संतति (पुत्र) लाभ प्राप्त करने की इच्छा पूर्ण करें, ताकि मैं इक्ष्वाकु वंश के ऋण से मुक्त हो सकूं। वशिष्ठ के अनुरोध मान लेने पर वह अयोध्या लौट आए। बारह वर्ष उपरांत वशिष्ठ के सहवास से साम्राज्ञी ख्1, ने गर्भ धारण किया और बारह वर्ष के बाद एक पुत्र को जन्म दिया।
अब महाभारत ख्2, के अनुशासन पर्व का दूसरा दृष्टांत देखेंःµ
एक बार वाकपदु इक्ष्वाकुवंशीय राजा सुदास ने अपने कुल पुरोहित अविनाशी संत, उत्तम ऋषि संपूर्ण संसार को हिलाने में समर्थ और दैविक ज्ञान के भंडार वशिष्ठ को सादर अभिवादन कर पूछा, हे पर आदरणीय निर्दोष ऋषि, तीनों लोगों में वह विचित्रतम वस्तु क्या है, जिसके निरंतर पूजन से सर्वोत्तम गुणों की प्राप्ति होती है। वशिष्ठ ने उत्तर में गुणों और उनकी उपादेयता का विस्तार पूर्वक वर्णन कर गाय की महत्ता बताई। उस जितेन्द्रिय नरेश ने ऋषि के उपदेश से प्रभावित होकर गायों के रूप में ब्राह्मणों को यथेष्ठ धन दिया। इससे उसे संत के रूप में ख्याति प्राप्त हुई।
सुदास के वशंजों से संबंधित संधि की तीसरी कथा महाभारत ख्3, के शांति पर्व में भी हैःµ
कश्यप ने पृथ्वी को जीत कर ब्राह्मणों को बसाया और स्वयं वन में चले गए। शूद्र और वैश्य ब्राह्मण स्त्रियों को सताने लगे। बलवान निर्बल को सताने लगे। संपत्ति पर किसी का अधिपत्य नहीं रहा। क्षत्रियों से आरक्षित पृथ्वी रसातल की ओर जाने लगी। कश्यप ने उसे अपने उरु पर धारण किया। अतः पृथ्वी उर्वी कहलाई तब पृथ्वी ने अपनी रक्षा के लिए कश्यप से एक राजा की याचना की। पृथ्वी ने कहा, मैंने हैहय वंश की विधवाओं से उत्पन्न अनेक क्षत्रियों को बचा रखा है। उनमें रिक्षावत पर्वत पर रीछों द्वारा पाले पोषे पुरुवंशी विद्वरथ का पुत्र भी है। मेरी इच्छा है कि वही मेरा रक्षक बने। इसी प्रकार गौरवशाली ऋषि पाराशर ने सुदास के वशंज सर्वकर्मण की रक्षा की है। अन्य राजाओं के वंशज द्योकार तथा स्वर्णकारों के रूप में देश के विभिन्न भागों में सुरक्षित हैं। उनके पितामह तथा पिता मेरे निमित्त पराक्रमी परशुराम द्वारा मार डाले गए थे। अस्तु मैं उनके हितों की रक्षा करके बदला चुकाना चाहती हूं। मैं अपनी रक्षा के लिए कोई
- उसका नाम मदयंति था। अनुशासन पर्व महाभारत में मदयंति को मित्रसाह की भार्या बताया गया है।
मित्रसाह कल्माषपाद का दूसरा नाम था।
देखें म्यूर खंड 1, पृ. 418-423 और 514
देखें म्यूर खंड 1, पृ. 374
देखें म्यूर खंड 1, पृ. 455-456