170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
असाधारण महापुरुष नहीं चाहती। मेरी तृष्टि तो एक साधारण शासक से भी हो जाएगी। अतः आप शीघ्र इस अभाव की पूर्ति करें। ‘‘कश्यप ने पृथ्वी द्वारा बताए गए क्षत्रियों को बुलाकर उन्हें राजाओं के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।’’
इस साक्ष्य को क्या कोई विश्वसनीय मान सकता है? मेरे अपने मतानुसार ऐसे साक्ष्य को स्वीकारना तो दूर रहा, इससे सावधान रहने की भी आवश्यकता है क्योंकि पहले तो सारी संधि - कथाओं का अंत ऐसी शांति में होता है जिसमें क्षत्रियों का तिरस्कार दर्शाया गया है। प्रत्येक कथा में क्षत्रियों का पराभव दर्शाया गया है। भरत वशिष्ठ के पुत्र है। उनके राज्य में दुर्भिक्ष पड़ता है। वे देश छोड़ते हैं। अतः उनका राज्य छिन जाता है। वे अपने पुरातन चिरशत्रु वरिष्ठ को अपना पुरोहित बनने तथा दुर्भिष की अपत्ति से बचने के लिए उनसे गिड़गिड़ाते हुए प्रार्थना करते हैं। भृगृ, क्षत्रियों, सोदास और कल्माषपाद के वृतांत में बताया गया है कि क्षत्रियों ने विजेता ब्राह्मणों को अपनी स्त्रियां देकर सुलह की। ये कहानियां ब्राह्मणों का यशोगान करने तथा क्षत्रियों को तिरस्कृत करने के लिए गढ़ी गई है। ऐसी दूषित, फूहड़ और निन्दनीय कहानियों को ऐतिहासिक सत्य नहीं माना जा सकता। ब्राह्मणवाद के समर्थक ही सत्य मान सकते हैं।
फिर जहां तक ब्राह्मणों और सुदास के वंशज शूद्रों के मध्य संघर्ष का संबंध है, इसके पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं कि उनमें सुलह हुई ही नहीं। वशिष्ठ के पौत्र और शक्ति के पुत्र पाराशर को जब यह विदित हुआ कि सुदास ने उसके पिता को जीवित जला दिया था तो उसने शूद्रों को सामूहिक संहार का प्रण किया। ऐसी ही एक प्रक्रिया वशिष्ठ ने सुदास के वंश के प्रति की थी। महाभारत में निस्संदेह यह बताया गया है कि वशिष्ठ ने बदला लेने के लिए पाराशर को सहमत किया और इस संबंध में उन्होंने भृगुओं और क्षत्रियों के संघर्ष का संदर्भ देते हुए बताया कि भृगुओं ने हिंसा का मार्ग न अपना कर क्षत्रियों पर किस प्रकार विजय पाई। यह वृतांत सत्य न होकर गढ़ा हुआ है, क्योंकि इनमें ब्राह्मणों की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास है।
ब्राह्मणों और शूद्रों में संधि न होने का सबसे सबल प्रमाण ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों के विरुद्ध बनाए गए विधान हैं। इनकी वृद्धि, उत्पत्ति और असाधारणता का वर्णन पहले ही किया जा चुका है। इन काले कानूनों की पृष्ठभूमि में समझौता या सुलह का प्रस्ताव स्वतः ही निरर्थक सिद्ध हो जाता है। ब्राह्मणों ने केवल शूद्रों से ही बदला नहीं लिया, उन्होंने बदले की भावना से शूद्रों की संतान को भी सदासर्वदा के लिए निर्दयतापूर्वक कठोरता से इन काले कानूनों के शिकंजे में कस दिया। अतः चांडालों और निषादों के विषय में जानकारी देना वांछनीय होगा।
चांडाल और निषाद मिश्रित (अंतर्जातीय विवाह से उत्पन्न) वर्णसंकर संतति है। निषाद अनुलोम हैं तथा चांडाल प्रतिलोम! अनुलोम उपनयन के अधिकारी हैं किन्तु ब्राह्मण पिता और शूद्र माता की संतान निषाद अनुलोम ख्1, होते हुए भी उपनयन के लिए कुपात्र ठहराया