अध्याय 11. संधि की कथा - Page 188

संधि की कथा

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IV

अंतिम प्रश्न यह है कि श्ूद्रों ने अधोपतन कैसे सहन कर लिया? इस प्रश्न के मूल में संभवतः यह मत है कि प्राचीन आर्यों में शूद्रों की संख्या विशाल थी। अस्तु विशाल जनसंख्या पाने वाले अल्प संख्यक ब्राह्मणों द्वारा उपनयन बंद कर देना सहन कर बैठे यह कुछ आश्चर्यजनक भले ही न हो, विचित्र अवश्य है। यह मत संभवतः हिंदुओं में शूद्रों की संख्या को दृष्टिगत रखते हुए निर्धारित किया गया लगता है। यह निराधार है। हिंदू समाज के शूद्र प्राचीन आर्यों के शूद्रों के वंशज नहीं हैं।

भारतीय आर्यों के शूद्र, और आधुनिक हिंदू समाज के शूद्र का अर्थ भेद न कर पाने के कारण ही यह भ्रम उत्पन्न हुआ है। आर्यों में यह एक जाति (वंश या कुल) विशेष का नाम था। किंतु हिंदू समाज मेंं ‘‘शूद्र’’ शब्द कोई स्वाभाविक नाम नहीं है। यह तथाकथित नीच अथवा असभ्य मानव वर्ग के लिए प्रयुक्त गुणवाचक संज्ञा है। यह मानव वर्ग सामान्यतः अनेक जातियों, कुलों, वंशों तथा कबीलों का समूह मात्र है जिनके रहन-सहन, खान पान रस्म रिवाज आदि में भिन्नता तथा विविधता है। सब एक साम्य है, और वह यह है कि वे सब हिंदू हैं और हिंदू संस्कृति के धरातल पर वे सबसे नीच हैं। उनको शूद्र कहना अनुचित है। उनका ब्राह्मणों को पीडि़त करने वाले आर्यों के शूद्रों से कोई संबंध नहीं है। यह दुखद बात है कि आधुनिक काल के निर्दोष और सामाजिक स्तर पर पिछड़े लोगों को मूल आर्यों से संबद्ध कर ही उन्हें दंडनीय बनाकर बेबस कर दिया गया है।

भारतीय आर्य समुदाय के शूद्रों और आधुनिक शूद्रों में अंतर है। धर्म सूत्रकार दोनों प्रकार के शूद्रों का अंतर भलीभांति जानते थे। अन्यथा वे सच्छूद्र का अर्थ सभ्य शूद्र और असच्छूद्र का अर्थ असभ्य शूद्र नहीं करते। निर्वासित शूद्र का अर्थ है गांव में रहने वाले शूद्र। अनिर्वासित ख्1, शूद्र का अर्थ है गांव से बाहर रहने वाले शूद्र। वास्तविकता यह है कि सच्छुद्र और निर्वासित शूद्र आर्य शूद्र हैं जब कि असच्छूद्र और निर्वासित शूद्र हिंदू शूद्र हैं। हमारे विचार का विषय आर्यों के शूद्र हैं जिनका हिंदू समाज के शूद्रों से कोई संबंध नहीं है। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि यदि हिदुंओं में शूद्रों की संख्या अधिक है तो आर्यों में भी शूद्रों की जनसंख्या बड़ी थी, यह तर्क तथ्यजनित न होने के कारण हमारे विचार का आधार नहीं बन सकता। हम यह ठीक तरह नहीं जानते कि आर्यों के शूद्र जाति, कुल या परिवार समूह थे। यदि हम उन्हें एक जाति मान लें तो भी उनकी संख्या कुछ सहस्त्र से अधिक नहीं रही होग। (ऋग्वेद 7.33.6) में भरतों की संख्या

  1. काणे कृत धर्मशास्त्र खंड द्वितीय (1) पृष्ठ 123 के अनुसार ये नाम शूद्रों के स्तर में हो रहे सुधार को

देखते हुए दिए गए थे। यह सत्य नहीं है।