174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
स्पष्ट रूप से अल्प बताई गई हैं शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पांचाल राजा सोन सत्रसाह के अश्वमेघ यज्ञ का वर्णन करते हुए बताया गया है - जब सत्रसाह ख्1, ने अश्वमेघ यज्ञ किया छह हजार छह सौ तीस कवचधारी तुर्वस विरोध में उठ खड़े हुए।
शूद्रों ने अपने दुख निवारण के लिए क्या किया? कुछ ब्राह्मणों ने, जिन्हें उन्होंने पीड़ा पहुंचाई थी, उन्होंने इनका उपनयन करने से इंकार कर दिया, वे दूसरे ब्राह्मणों से, जिनसे उन्होंने कोई क्लेश तक न किया था, सहयोग नहीं ले सकते थे। यह संभावना परिस्थितियों पर निर्भर करती है। सर्व प्रथम उन्हें यह मालूम नहीं था कि ब्राह्मण गोलवंद हो गए हैं। वे इस षडयंत्र से बेखबर रहे। अन्यथा इस गोलबंदी को तोड़ा जा सकता था। लेकिन स्पष्ट है ख्2, कि ऋग्वेदिक काल में ही ब्राह्मण एक वर्ग या जाति बन गए थे तथा उनमें जाति वाद भी भावना पैठ कर चुकी थी। ऐसी दशा में ब्राह्मणों की दुरभि संधि को कुचलना शूद्रों के लिए दुष्कर क्यों था? द्वितीय उपनयन करना कुल पुरोहित का अधिकार बन चुका था। यह राजा निमि ख्3, की कथा से स्पष्ट हो चुका है।
यदि इन सब के सूत्र जोड़े जाएं तो प्रत्यक्षतः ब्राह्मणों द्वारा अपने विरुद्ध गठित संयुक्त मोर्चें का विरोध करने में शूद्र असमर्थ थे।
दूसरी संभावना यह हो सकती थी कि सभी क्षत्रिय मिलकर गुट बना लेते जिससे ब्राह्मणों का विरोध निष्प्रभाव हो जाता। यह संभावना तो केवल अनुमान मात्र है क्योंकि पहले तो शूद्र यह समझ ही नहीं पाए कि उपनयन बंद हो जाने के क्या फलितार्थ होंगे। दूसरी बात यह कि क्षत्रिय संगठित न थे और यह बात ऋग्वेद में वर्णित दासराज्ञ युद्ध से प्रगट होती है कि शूद्र क्षत्रियों और अशूद्र क्षत्रियों के मध्य प्रेम या सौजन्य नाम की कोई चीज शेष नहीं बची थी।
इसलिए कोई असमंजस नहीं कि शूद्रों ने उक्त परिस्थितियों के संदर्भ मेंं ब्राह्मणों की इस बात को मान लिया हो कि वे उपनयन के अधिकारी नहीं है।
आलेन, लाईफ आफ बुद्धा पृष्ठ 404
काणे खंड 2, (1) पृष्ठ 29
वहीं पृष्ठ 175