175
अध्याय 12
सिद्धांत की परख
I
इस शोध का उद्देश्य शूद्रों की उत्पत्ति का स्रोत ढूंढ़ना तथा उनके पतन के कारणों को
खोजना है। ऐतिहासिक घटनाओं तथा प्राचीन एवं अर्वाचीन शोधकर्ताओं के सिद्धांतों के निष्कर्षों के उपरांत मैंने एक नया मत प्रतिपादित किया है। यह मत पिछले अध्यायों में अलग-अलग अध्यायों के साथ प्रकट किया गया है। आइए अब इस विश्रंलित सामग्री को एकत्र करें और शोध के संबंध में पूर्ण एवं परिपक्व जानकारी प्राप्त करें। यह संक्षेप में इस प्रकार हैःµ
शूद्र सूर्यवंशी आर्य जातियों के एक कुल या वंश थे।
भारतीय आर्य समुदाय में शूद्र का स्तर क्षत्रिय वर्ण का था।
एक समय आर्यों में केवल तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही थे। शूद्र अलग
वर्ण नहीं था बल्कि क्षत्रिय वर्ण का ही एक भाग था।
- शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों में निरंतर संघर्ष चलता रहा, जिससे ब्राह्मणों को अत्याचार,
उत्पीड़न और अपमान सहना पड़ा।
- शूद्रों के अत्याचार व उत्पीड़न से त्रस्त ब्राह्मणों ने प्रतिशोध के कारण उनका उपनयन
बंद कर दिया।
- उपनयन (यज्ञोपवीत) पर प्रतिबंध से शूद्रों का सामाजिक पतन हुआ और वे वैश्यों
से निचली सीढ़ी पर आ गए। उनका स्तर वैश्यों से भी निम्न हो गया। परिणाम
स्वरूप वे समाज का चौथा वर्ण बना दिए गए।
अब सिद्धांत की यथार्थता का मूल्यांकन शेष रह गया है। मैं इसे विद्वान शोधकर्ताओं तथा दूसरे विद्वानों अथवा पाठकों के विवेक पर छोड़ देता हूं। मैं इससे हटकर स्वयं अपने सिद्धांत का परीक्षण करना श्रेयस्कर समझता हूं क्योंकि इससे मुझे अपने सिद्धांत को मान्यता दिलाने का पूर्ण अवसर प्राप्त होगा।
II
मैं यह जानता हूं कि मेरे आलोचक मित्र यह कह सकते हैं कि मेरा कथन महाभारत के उस एकमात्र प्रसंग पर आधारित है जिसमें पैजवन को शूद्र कहा गया है। पैजवन और सुदास का संबंध भी संदिग्ध है। पैजवन का शूद्र के रूप में वर्णन महाभारत के एकमात्र