5
अदालत से यह आदेश प्रापत कर लेना संभव नहीं हैं कि वह किसी खास वर्ण से संबंधित हैं। ब्रिटिश भारत की अदालतों में यदि किसी व्यक्ति के वर्ण के प्रश्न पर विचार किया गया तो यह सिर्फ विवाह, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों तक सीमित था, जिसके नियम वर्ण के अनुसार जिससे पक्षकार का संबंध होता था अलग-अलग होते थे। यह सही है कि ब्रिटिश भारत का कानून हिंदुओं के चार वर्णों को मान्यता प्रदान नहीं करता लेकिन इसका अर्थ समझने में सावधानी बरतनी होगी और इस संबंध में भ्रांति नहीं होनी चाहिए। साररूप में हम कह सकते हैंःµ
(1) इसका आशय यह नहीं कि वर्ण व्यवस्था पर अमल करना कोई जुर्म है।
(2) इसका मतलब यह नहीं कि वर्ण व्यवस्था विलुप्त हो चुकी है।
(3) इसका अर्थ यह नहीं कि जब किसी के वैयक्तिक अधिकारों की आवश्यकता का प्रश्न उठे तो वर्ण व्यवस्था आड़े नहीं आए।
(4) इसका सिर्फ यह तात्पर्य है कि वर्ण व्यवस्था के प्रति सामान्य प्रतिबंध समाप्त हो गए हैं। फिर कानून ही तो अकेली मान्यता नहीं है जो दूसरे सामाजिक संस्थानों को संतोषित कर सके। संस्थाओं का परिपालन अन्य मान्यताओं के द्वारा भी होता है। इनमें धार्मिक मान्यता और सामाजिक मान्यता बहुत महत्वपूर्ण है। वर्ण व्यवस्था को धार्मिक स्वीकृति मिली हुई है और चूंकि उसे धार्मिक मान्यता मिली हुई है तो वर्ण व्यवस्था को हिंदू समाज की पूर्णतम सामाजिक मान्यत भी प्राप्त है। इस पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। यह धार्मिक मान्यता वर्ण व्यवस्था का प्रभुत्व बनाए रखने के लिए काफी है। किसी कानून के द्वारा लागू न होने के बावजूद वर्ण व्यवस्था जीवित है। यह इस बात से सिद्ध होता है कि हिंदू समाज में अस्पृश्यों और शूद्रों का दर्जा ज्यों का त्यों विद्यमान है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि इस प्रकार का अध्ययन निरर्थक है।
जहां तक राजनीतिक मानसिकता से ग्रस्त हिंदू का प्रश्न है उसको गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। आमतौर पर उसकी दृष्टि तात्कालीन उपलब्धियों पर होती है न कि दूरगामी सोच विचार पर। वह कम से कम प्रतिरोध का विचार करता है और किसी भी मामले का जहां कितना भी आवश्यक हो यदि उसे अलोकप्रिय बनाता है तो स्थगित करने के तत्पर रहता है। यदि राजनीतिक मानसिकता से ग्रस्त हिंदू इस गं्रथ को निरर्थक मानते हैं तो यह स्वाभाविक है।
इस प्रबंध ने आर्य समाजियों की भी सिर से पैर तक जम कर खबर ली है। दो अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उनकी विचाराधारा से मेरे निर्णयों का तीव्र मतभेद है। आर्य समाजी मानते हैं कि भारतीय आर्य समुदाय के चारों वर्ण आदिकाल से प्रचलित है। इस पुस्तक का कथन है कि एक ऐसा समय था जब भारतीय आर्य समुदाय में मात्र तीन वर्ण थे। आर्य समाजी मानते हैं कि वेद शाश्वत और परम पवित्र है। इस पुस्तक में कहा गया है कि वेदों के कुछ अंश विशेषतया पुरुष सूक्त जो आर्य समाजियों का प्रधान आधार है,