अध्याय 12. सिद्धांत की परख - Page 191

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

स्थल के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलता। ऐसे लचर तर्क पर स्थापित सिद्धांत कैसे स्वीकार किया जा सकता है? वे इसे श्रृंखला की कमजोर कड़ी कह सकते हैं। परंतु मुझे विश्वास है कि इतनी आसानी से मेरे कार्य का तिरस्कार नहीं किया जा सकता।

प्रथम तो मैं इस मत से सहमत नहीं हूं कि एकमात्र साक्ष्य के आधार पर कोई मत स्थापित नहीं किया जा सकता। कानून का अटल सिद्धांत है कि साक्ष्यों का महत्व देखना चाहिए न कि संख्या। फिर महाभारत के रचनाकार के पास कोई ऐसा स्पष्ट कारण न था, जिससे वह असत्य वर्णन करता। कृति की रचना से लेकर आज तक रचियता पर पक्षपात आदि का लांछन भी नहीं लगा है।

अतः ‘‘पैजवन शूद्र था’’ इस कथन में संदेह का कोई कारण नहीं है। यह निर्विवाद निष्कर्ष है कि रचनाकार ने परंपरागत सत्य प्रतिपादित किया है।

यह कहना है कि ऋग्वेद में पैजवन को शूद्र नहीं बताया गया, महाभारत के कथन के विरोध में नहीं है। ऋग्वेद में पैजवन के वर्णन विवरण में शूद्र शब्द की ओर ध्यान न जाने के अनेक दृष्टांत दिए जा सकते हैं। पहला तो यह ही कि ऋग्वेद एक धार्मिक ग्रंथ है। इसलिए उसमें शूद्र के वर्णन की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसा उल्लेख अप्रासंगिक होगा। महाभारत एक ऐतिहासिक कृति है। उसमें यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि पैजवन किस वर्ण या कुल का था।

जहां तक सुदास के लिए शूद्र शब्द का यदा कदा प्रयोग होने का तर्क है मैं इसे अनावश्यक समझता हूं। कुल गोत्र जाति इत्यादि का वर्णन तो वास्तव में व्यक्तित्व को निश्चित करने के ध्येय से किया जाता है। प्रसिद्ध पुरुषों के लिए तो यह आवश्यक ही होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सुदास अपने समय का एक प्रख्यात व्यक्ति था। अतः व्यक्तित्व निर्धारण के उद्देश्य से उसे शूद्र कहना आवश्यक न था। यह मात्र कल्पना नहीं है। इस संबंध में अनेक साहित्यिक उदाहरण दिए जा सकते हैं। देखें बुद्ध के समय में बिम्बसार और प्रसेनजित दो राजा थे। उनके समकालीन अन्य सभी राजाओं का तत्कालीन साहित्य में सगोत्र वर्ण किया गया है किंतु बिंबसार और प्रसेनजित का उल्लेख अनेक व्यक्तिगत नामों से ही किया गया है। प्रो. ओल्डनबर्ग ख्1, ने इसका कारण यह बताया है कि दोनों राजा ख्याति प्राप्त थे। अतः उनके सगोत्र विवरण की आवश्यकता ही नहीं थी।

III

यह मान लेना अन्यायपूर्ण होगा कि मेरा सिद्धांत महाभारत के एकमात्र पैराग्राफ में वर्णित पैजवन और सुदास एक ही व्यक्ति थे के प्रसंग पर ही टिका है। वास्तव में ऐसा नहीं है। ऋग्वेद में सुदास का प्रसग और पैजवन को शूद्र बताया जाना मात्र इस श्रृंखला की कड़ी नहीं है। पैजावन और सुदास एक ही व्यक्ति के दो नामे थे। मेरे मत का केवल एक ही आधार नहीं है। अन्य भी प्रमाण हैं। प्रथम तो यह कि शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय

  1. लाईफ आफ बुद्ध, पृष्ठ 414