शूद्र कौन थे - Page 21

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

ब्राह्मणों की कल्पना मात्र है जो उनके स्वार्थ की पूर्ति करती है। यह दोनों ही निष्कर्ष आर्य समाजियों के विचारों के लिए एटमबम का काम करेंगे।

आर्य समाजियों के साथ इस प्रकार के संघर्ष से मुझे कोई खेद नहीं है। वेदों को आर्यसमाजियों ने शाश्वत, अनादि, अनंत और संदेहातीत प्रचारित करके हिंदू समाज को एक जड़ समाज बनाकर बड़ा अहित किया है तथा हिदुंओं के सामाजिक संगठनों को वेद आधारित भी कहा है जो शाश्वत, अनादि, अनंत और संदेहातीत है इसलिए उसमें कोई भी परिवर्तन अनावश्यक है। एक समाज में इस प्रकार की धारणा का विस्तार अत्यंत बुरी बात है। मैं मानता हूं कि आर्य समाजियों की यह विचार धारा जब तक पूर्ण रूपेण खत्म नहीं कर दी जाती तब तक हिंदू समाज स्वयं को सुधारने की आवश्यकता अनुभव नहीं करेगा और अगर कुछ नहीं तो यह पुस्तक इस उद्देश्य को अवश्य पूरा करती है।

मैं कल्पना कर सकता हूं कि इस पुस्तक पर रूढि़वादी हिंदुओं की क्या प्रतिक्रिया होगी। क्योंकि मैं अरसे से उनके साथ लोहा ले रहा हूं। बस मैं केवल इतना नहीं समझ पाता कि एक विनम्र और अहिंसक दिखने वाला हिंदू उस समय कितना हिंसक हो उठता है जब कोई उनके पवित्र ग्रंथों की परतें खोलता है। मुझे इसका कड़वा अनुभव पहली बार पिछले साल ही हुआ। जब मैंने मद्रास में इस विषय में एक अभिभाषण दिया तो मेरे पास ऐसे क्रुद्ध हिंदुओं के पत्रों की झड़ी लग गई जिनसे पता चला कि हिंदुओं का कितना दिमागी संतुलन गड़बड़ाया। उन पत्रों में गंदी गालियों की बौछार थी जिनका उल्लेख और प्रकाशन नहीं किया जा सकता जिनमें मुझे जान से मार डालने की धमकियां भी थी। पिछली बार मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु कह कर धमकियां देने के बाद वे ठंडे पड़ गए। पता नहीं इस बार वे क्या गुल खिलाएंगे। क्योंकि वे इस पुस्तक का चौथा अध्याय और उसके उद्धरण देखेंगे जहां उनके राजनीतिक छल, कृतित्व में तरफदारी और उद्देश्य में प्रपंच की कलई खोली गई है तो उनका पासा सातवें आसमान पर ही चढ़ जाएगा। मैं उनकी निंदा और धमकियों में आने वाला नहीं। क्योंकि मैं जानता हूं कि वे ही सत्यानाश की जड़ है जो अपने धर्म की रक्षा की दुहाई देंगे और जिन्होंने धर्म को कमाई का धंधा बनाया हुआ है। वे दुनिया भर से परले सिरे के स्वार्थी हैं और अपनी धूर्तता को अपने वर्ग के निहित स्वार्थों के लिए बाजार में भुनाते हैं। यह कम आश्चर्यजनक बात नहीं है कि जब रूढि़वादिता के पागल कुत्ते किसी ऐसे व्यक्ति पर टूट पड़े जिसने हिंदुओं के तथाकथित पवित्र ग्रंथों की धज्जियां उड़ाने के लिए आवाज उठाई हो। ऊंचे आसनों पर विराजमान हिंदू जो स्वयं को उच्च शिक्षित बताने की ढोंग रचे बैठे हैं वे अपनी आंखें मूंद लेंगे, उनकी नीयत डिग जाएगी और वे यह सिद्ध करेंगे कि वे तटस्थ हैं। फिर भी तरफदारी में उठ खड़ें होंगे। यहां तक कि उच्च न्यायालयों के हिंदू न्यायाधीशों, रियासतों के हिंदू प्रधानमंत्रियों को उनका साथ देने में झिझक नहीं होगी। वे तो और भी आगे बढ़ेंगे। वे शिकार के लिए मात्र हांका न देकर स्वयं शिकार के लिए उद्यत हो जाएंगे। सबसे निर्लज्ज बात यह है कि वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें यह