शूद्र कौन थे - Page 22

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पता है कि उनकी सामाजिक हैसियत से उन लोगों में डर पैदा होगा जो रूढि़वादिता के विरोधी हैं। मैं उन भ्रद पुरुषों को यह बताना चाहता हूं कि वे मुझे अपने अभिशापों से विचलित नहीं कर पाएंगे। उन्हें शायद डॉ. जानसन के गंभीर और उदाहरण योग्य वचनों का ज्ञान नहीं है जब वे प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझ रहे थे। उस समय उन्होंने कहा था कि ‘‘मैं एक ठग को पकड़ने के लिए एक गुंडें की धमकियों से नहीं डरूंगा। मैं ऊंचें पदों पर विराजनमान आलोचकों के प्रति कठोर नहीं होना चाहता, लेकिन उतना अवश्य कहना चाहता हूं कि उनकी भूमिका एक गुंडे की तरह है ताकि एक धोखेबाज पलायन कर जाएं।’’ मैं उन्हें दो बातें बताना चाहता हूं। प्रथमतः मैं डाक्टर जानसन के दृढ़ निश्चय का अनुगमन करना चाहता हूं, जो उन्होंन धर्म ग्रंथों के विषय में इस ऐतिहासिक सत्य के उद्घाटन में किया ताकि हिंदू जान सकें कि इन धर्म ग्रंथों में निहित सिद्धांत ही देश और समाज के अद्यःपतन के लिए उत्तरदायी है। दूसरे यह कि यदि इस पीढ़ी के हिंदू, जो मैंने कहा है, उन पर ध्यान नहीं देंगे तो भावी पीढ़ी अवश्य ही उस पर ध्यान देगी। मुझे सफलता के प्रति तनिक भी निराशा नहीं। क्योंकि मुझे कवि भवभूति के कथन से यह सांत्वना मिलती है जिसमें उन्होंने कहा था, ‘‘समय अतंत है, पृथ्वी विस्तृत है, एक दिन एक ऐसे पुरुष का जन्म होगा जो मेरे कथन की प्रशंसा करेगा। जो भी हो, यह ग्रंथ रूढि़वादियों के लिए एक चुनौती है।

हिंदुओं के केवल एक ही वर्ग द्वारा इस प्रस्तक का स्वागत किया जा सकता है। ये वे लोग हैं जो सामाजिक सुधार की आवश्यकता और महत्व का अनुभव करते हैं। उनके विचार में यह एक समस्या ऐसी है जिसे सुलझाने में लंबा समय लगेगा। इसके लिए कई भावी पीढि़यों का जूझना पड़ सकता है परंतु इससे इस समस्या के अध्ययन में ढील देने का कोई औचित्य नहीं है। यहां तक कि कोई उत्साही हिंदू, राजनेता, यदि वह ईमानदार है, वह भी स्वीकार करेगा कि सांप्रदायिकता के विष से उत्पन्न समस्याएं जो हिंदुओं के सामाजिक संगठन को विरासत में मिली है और जिनकी ओर से हिंदू राजनेता शुर्तुमुर्ग की तरह रेत में गर्दन गड़ा लेते हैं। वे हर मोड़ पर इन राजनीतिज्ञों को घेर लेंगे। ये समस्याएं क्षणिक संकट की नहीं है,ं ये हमारे लिए स्थायी मुसीबत है बल्कि यह कहा जाए कि यह कदम-कदम पर हमारी नाक में दम कर सकेंगी। मुझे प्रसन्नता है कि हिंदुओं में ऐसा वर्ग मौजूद है, बेशक वे मुट्ठी भर हों जिन्हें इसका अहसास है। वही मेरा मुख्य लक्ष्य है और मेरे तर्क उन्हीं के लिए हैं।

कोई कह सकता है कि हिंदुओं के पवित्र ग्रथों का जो सम्मान और आदर किया जाना चाहिए वह मैं नहीं करता। अगर यह आरोप सही है तो आपने इस व्यवहार के समर्थन में मैं दो परिस्थितियों का जिक्र करना चाहूंगा। पहली बात यह है कि अपने अनुसंधान में मैंने इतिहासकार की उन श्रेष्ठ परंपराओं को निभाया है जो पूरे साहित्य को अश्लील मानते हैं - मैं इस शब्द का प्रयोग मूल भाव को लेकर जन भाषा में कर रहा हूं जिसे मान्य नियमों और साक्ष्यों की कसौटी पर कसा जाना चाहिए, जिसके लिए मैंने