शूद्र कौन थे - Page 23

8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

पवित्र अपवत्रि के बीच कोई अंतर नहीं माना और जिसका एकमात्र उद्देश्य सत्यान्वेषण था। यदि इस परंपरा को निभाने के कारण यह पाया जाता है कि मेरे मन में पवित्र धार्मिक ग्रंथों के प्रति अश्रद्धा भाव है तो एक लेखक के रूप में यही मेरा उत्तर है। दूसरे पवित्र ग्रंथों के प्रति श्रद्धा बरबस नहीं जगाई जा सकती। उनका उदय सामाजिक कारकों से होता है जिनसे ऐसी भावना का स्वतः उदय हो जाता है और अन्य प्रयास तो कृत्रिम ही होता है। इन पवित्र ग्रंथों के प्रति ब्राह्मण लेखकों में अगाध श्रृद्धा और सम्मान भाव का होना स्वाभाविक है। परंतु किसी गैर ब्राह्मण हृदय में ऐसा भाव उत्पन्न होना आश्रेय है इस भिन्न मनोभाव के अंतर की यही सरल सी व्याख्या है। कोई ब्राह्मण लेखक इस पवित्र साहित्य को सहज भाव से लेगा और उसके प्रति नतमस्तक भी होगा और उस व्यक्ति पर बरसेगा ही जो अनासक्त भाव से केवल एक बुद्धिवादी अध्येता के रूप में उसकी विवेचना करता है। उसके लिए पवित्र साहित्य क्या है। यह वह साहित्य है जिसकी रचना महज ब्राह्मणों ने की है। दूसरी बात है कि इसकी धुरी ही गैर-ब्राह्मणों की सत्ता स्थापित करना है। भला ब्राह्मण इस साहित्य की श्रेष्ठता की ढपली क्यों नहीं बजाएंगे? एक ही कारण से ब्राह्मण इसकी पुष्टि करेंगे और गैर ब्राह्मण इसे ठुकराएंगे। इस तथ्य को पहचान कर कि जिसे पवित्र साहित्य कहा गया है वह जुगुप्सा से भरे सामाजिक दर्शन का पोखर है जिससे सामाजिक हीनता उपजी है तो गैर ब्राह्मण उसके प्रति ब्राह्मणों के विपरीत ही रुख अपनाएगा। उस समय यह बात किसी को विचित्र नहीं लगेगी यदि कोई यह ध्यान रखेगा कि मैं अब्राह्मण ही नहीं अछूत भी हूं तो इस पवित्र साहित्य के प्रति मेरे मन में श्रद्धा और सम्मान कहां से आएगी? स्वाभाविक है कि इस पवित्र साहित्य के प्रति मेरी वितृष्ठा किसी अब्राह्मण से घट कर नहीं हो सकती। जैसा कि प्रोफेसर थोर्नडाइक कहते हैं - ‘‘सोचना हमारा जैविक स्वभाव है किन्तु जैसा सोचते हैं उस पर हमारे सामाजिक स्वभाव का प्रभाव होता है।’’

मैं जानता हूं कि धार्मिक ग्रंथों के प्रति ब्राह्मण और अब्राह्मण विद्वानों के रुझान में अंतर है जो कि हिंदुओं के सामाजिक इतिहास की समस्याओं के अध्ययन का मुख्य स्रोत है। पहला वर्ग अंधभक्ति से उसका गुणगान करेगा और दूसरा वर्ग उसके हर पहलू को हेय मानेगा। ऐतिहासिक अनुसंधान के लिए यह हानिकारक बात है।

ब्राह्मण लेखकों ने इतिहास के साथ जो शरारत की वह स्वाभाविक है। इस साहित्य की पवित्रता बनाए रखने में उनकी दोहरी चाल है। पहली बात तो यह कि उनके पूर्वजों ने जो लिखा उसका औचित्य बताना उनका पुत्रोचित कर्तव्य था जिसके लिए उन्होंने सत्य का गला घोंटने के लिए रस्सी को कस कर थामा हुआ है। दूसरी बात यह है कि इससे ब्राह्मणों की श्रेष्ठता बरकरार रहे, यह ध्यान रखना उनका परम धर्म है। कहीं सिंहासन डोल न जाए। उस प्रणाली को भी वह कायम रखना चाहता है, जिससे उसे हलवा मांडा प्राप्त होता रहे। इस प्रथा के जनक अपने पूर्वजों को भी सही ठहराना चाहता है इसलिए