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वह चुपचाप उसे निष्पाप जताने के लिए प्रयासरत रहा है। यही बात ब्राह्मणों के मन में धर किए बैठी है जो उसे सत्य की खोज और उस सत्य को प्रचारित करने से रोकती है। इसलिए यह पाया जाता है कि ब्राह्मणों ने ऐतिहासिक अनुसंधान के लिए तिथि निर्धारण और वंश वृक्ष तैयार करना छोड़ कर अत्यल्प प्रयास किए हैं। अब्राह्मण विद्वानों के सामने ऐसी कोई सीमा नहीं है इसलिए वे सत्य शोधन के भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। अध्येताओं के दो वर्गों के बीच यह अंतर होना कोई अनहोनी बात नहीं है यह पुस्तक इस संबंध में एक उदाहरण है, शूद्रों के खिलाफ षडयंत्र के असली चरित्र का इससे पता चलता है। किसी भी ब्राह्मण विद्वान को इसे प्रस्तुत करने का साहस नहीं हो सका।
यह भी सच है कि अब्राह्मण विद्वान ब्राह्मण विद्वानों की मनोवृत्ति से भिन्न है और वे इस सीमा तक जा सकते हैं कि पूरे साहित्य को पौराणिक और काल्पनिक बताकर कहें कि इसमें गांभीर्य नहीं हैं इसे खत्ते में डाल दिया जाए। एक इतिहासकार की ऐसी भावना नहीं होनी चाहिए। यह कथन है - एक इतिहासकार को सटीक, ईमानदार, निष्पक्ष, द्वेष रहित, रूचि, भय, क्षोभ और पूर्वाग्रह से मुक्त, सत्य निष्ठ होना चाहिए जो इतिहास का मूल है, वह उन महान घटनाओं का संरक्षक, उपेक्षा का शत्रु, अतीत का साक्षी और दूरदर्शी होना चाहिए। संक्षेप में वह मुक्त विचारों वाला हो, पर उसका खाली दिमाग न हो और प्रत्येक साक्ष्य की निरख परख करे चाहे वह अपमिश्रित भी क्यों न हों। अब्राह्मण इतिहासकार यह भूमिका निभाने में कदाचित कठिनाई अनुभव करें। वे सत्यानुसंधान में गैर ब्राह्मणवादी राजनीति का समावेश कर सकते हैं या प्राचीन साहित्य को इंद्रजाल बना सकते है। यह न्याय संगत नहीं। मैं निश्चय के साथ कह सकता हूं कि मैंने अपनी इस
खोज में स्वयं को पूर्वाग्रह से मुक्त रखा है। शूद्रों के विषय में लिखते समय मैंने शूद्र इतिहास के अतिरिक्त अन्य शेष बातों पर ध्यान नहीं दिया है। मुझे बखूबी पता है कि इस देश में गैर ब्राह्मण आंदोलन चल रहा है जो शूद्रों का राजनीतिक आंदोलन भी है। यह भी सर्वविदित है कि मैं इससे संबद्ध हूं, किन्तु विश्वास है कि पाठकों को पता चलेगा कि मैंने इस पुस्तक को गैर ब्राह्मण राजनीति का स्वरूप नहीं दिया है।
ऐसी मुझे आशंका है कि इस विषय की प्रस्तुति में मुझसे बहुत सी त्रुटियां हुई होंगी। पुस्तक में उद्धरणों की भरमार है उनमें से भी अनेक बहुत लंबे-लंबे हैं। यह पुस्तक कोई कलाकृति नहीं है, हो सकता है कि पढ़ते-पढ़ते पाठक उकता भी जाएं। परंतु यह दोष सिर्फ मेरा ही नहीं है। मेरे हाथ में होता तो मैं उन पर छटाई के लिए खूब कतरब्योंत करता परंतु यह पुस्तक सरल और अबोध शूद्रों के लिए लिखी गई है कि उनकी यह दशा कैसे हुई और वे हैं कौन? उन्हें पता नहीं कितने करीने से यह ग्रंथ लिखा गया है? उनसे अपेक्षा यह है कि वे इस परिश्रम का पूरा लाभ उठाएं - जितना संभव है उतना अच्छा होगा। जिन्हें भी मैंने इसकी पांडुलिपि दिखाई उनका विचार उद्धरणों को बनाए रखने के पक्ष में था। दरअसल उनकी अपेक्षा इतनी अधिक थी कि उन्होंने पुस्तक में