10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
उद्धरणों के अंग्रेजी अनुवाद देने के साथ-साथ परिशिष्ट में मूल संस्कृत उद्धरण देने की बात कही। उनका आग्रह मुझे भुलाना पड़ा क्योंकि यह सामग्री फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हमें याद रखना है कि शूद्रों के कंधों पर बंदूक रखकर ही इस कुख्यात चातुर्वर्ण्य को जीवित रखा जा सकता है। हालांकि यह उनके उत्पीड़न का आधार है और वह भी शूद्र ही हैं जो इसको नेस्तानाबूद कर सकते है। इसलिए आसानी से समझा जा सकता है कि मैंने यह अवश्य माना कि शूद्रों को अवगत कराया जाए और उन्हें इस पवित्र कार्य का बीड़ा सौंपा जाए। इसलिए मैंने यह उचित नहीं समझा कि उद्धरणों की भरमार से पिंड छुड़ाया जाए या उन्हें संक्षिप्त कर दिया जाए।
मैं तीन व्यक्तियों के प्रति आभार प्रकट करना चाहूता हूं। सबसे पहले तो महाभारत के शांतिपर्व के साठवें अध्याय के लेखकों का। चाहे वह व्यास हो, वैशम्पायन हो, सूत हो, लोमहर्षण हो या भृगु। परंतु वह कोई भी रहा हो उसने पैजावन का पूर्ण विवरण देकर महान सेवा की है। यदि उसने यह न बताया होता कि पैजावन शूद्र था जो शूद्र का कुल
खोज पाना पूरी तरह असंभव था। मैं उस लेखक के प्रति आभार प्रकट करना चाहता हूं कि उसने जानकारी का इतना महत्वपूर्ण अंश भावी पीढि़यों के लिए संजोया। ऐसा न होता तो यह पुस्तक लिखी भी न जाती। फिर से इस्माइल कालेज (बंबई) के प्रोफेसर कांगले का आभारी हूं। उन्होंने पुस्तक में उल्लिखित संस्कृत श्लोकों के अनुवाद का अन्वीक्षण कर मुझ पर उपकार किया। क्योंकि मैं संस्कृत का विद्यार्थी नहीं रहा इसलिए मैं आश्वस्त हो गया कि मैंने संस्कृत सामग्री के साथ गड़बड़ घोटाला नहीं किया है। परंतु उसका अर्थ यह नहीं कि मैं वे गलतियां उनके मत्थे मढ़ दू जिन्हें मेरे आलोचक ढूंढ़ निकालें। मैं बंबई के सिद्धार्थ कालेज के प्रोफेसर मनोहर चिटनिस को भी धन्यवाद देता हूं जिन्होंने अनुक्रमणिका तैयार की।
मैं अपने न्यूयार्क के प्रकाशक मैसर्स चार्ल्स स्क्रिबनर्स संस पब्लिशर्ज का भी कृतज्ञ हूं जिन्होंने श्री मेडीसन ग्रांट के ‘‘पार्सिंग आफ द ग्रेट रेस’’ तीन पुनर्मुद्रण की अनुमति दी जो इस पुस्तक के परिशिष्ट II, III और IV में समाविष्ट हैं।
10 अक्तूबर, 1946
राजगृह
दादर, बम्बई-14
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर