अध्याय-1
शूद्रों की गूढ़ समस्या
यह बात प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि श्ूद्र भारतीय आर्यों के समाज का चौथा वर्ण है, किन्तु यह जानने की कोशिश कुछ ने ही की कि शूद्र कौन थे और वे चौथा वर्ण कैसे बने। ऐसी महत्वपूर्ण जिज्ञासा अपरिमित है। इसलिए यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि शूद्र चौथे वर्ण में कैसे आए? क्या ऐसा समाज के क्रमिक विकास के परिणामस्वरूप था या फिर वे चक्रावर्तन के कारण चौथे वर्ण में आए?
यह जानने के लिए कि शूद्र कौन थे और वे चौथे वर्ण में कैसे आए हमें सबसे पहले भारतीय आर्य समुदाय की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की व्युप्तत्ति की जानकारी करनी आवश्यक है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की व्युत्पत्ति की जानकारी करनी आवश्यक है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का अध्ययन ऋग्वेश के 10वें मंडल के 19वें मंत्र, जिसे पुरुष कहते हैं, से आरंभ करना होगा। इस मंत्र में कहा गया हैःµ ख्1,
सर्वप्रथम वेदों के विचारों को देखा जाएःµ
(1) पुरुष के एक सहस्र शीश है, एक सहस्र चक्षु, एक सहस्र चरण हैं। वह सर्वत्र
परिपूर्ण है। व्यापक है और उसने दस अंगुल की परिधि में संपूर्ण ब्राह्मांड
को ग्रहण कर रखा है।
(2) पुरुष स्वयं संपूर्ण (ब्रह्मांड) है जो वर्तमान भी है और भावी भी हैं। वह
अमरत्व है। बीज (अन्न) से उसका विस्तार होता है।
(3) ऐसी है उसकी महानता और पुरुष इस से भी श्रेष्ठ है। सारी सृष्टि उसका
चतुर्थांश है और उसका तीन चौथाई अविनाशी अंश अंतरिक्ष में है।
(4) अपने तीन चौथाई अंश से पुरुष ऊपर उठा और उसका एक चौथाई अंश
यहां पुनः प्रादुर्भूत हुआ है, फिर वह सर्वत्र विलीन हो गया - उन सभी खाद्य
और अखाद्य पदार्थों में।
(5) उससे विरज उत्पन्न हुआ और विरज से पुरुष जन्म लेते ही वह संपूर्ण धरती
- म्योर्स ओरिजनल संस्कृत टैक्सटस खंड 1 पृष्ठ-9