अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 27

12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

पर आच्छादित हो गया, आगे भी और पीछे भी।

(6) जब देवों ने पुरुष की आहुति से यज्ञ किया तो वसंत उसका घी, ग्रीष्म ईंधन

और शरद समिधा हो गई।

(7) आरंभ में जन्म लेने वाले पुरुष को उन्होंने यज्ञ की दूर्वा पर बलि चढ़ा दिया।

देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने उससे यज्ञ किया।

(8) उस विश्वव्यापी यज्ञ की हवि से दही और धृत उपलब्ध हुए। इससे वे पक्षी

और पशु जंगली तथा पालतु उत्पन्न हुए।

(9) उस विश्वव्यापी यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद की ऋचाएं निकलीं और यजुर्वेद

के मंत्र निकले।

(10) उससे अश्व निकले और दो जबड़ों वाले सभी पशु उत्पन्न हुए, गाय उत्पन्न

हुई और उसी से भेड़-बकरी भी निकली।

(11) जब देवताओं ने पुरुष को विभाजित किया जो उसे कितने भागों में बांटा?

उसका मुख क्या था, उसकी भुजाएं क्या थीं, उसकी जंघाएं क्या थीं और

उसके चरण क्या थे?

(12) ब्राह्मण उसके मुख, राजन्य उसकी भुजाओं, वैश्य उसकी जंघाओं तथा शूद्र

उसके पैरों से उत्पन्न हुए।

(13) उसकी आत्मा (मन) से चन्द्रमा, उसके चक्षुओं से सूर्य, उसके मुख से इंद्र

और अग्नि और उसके श्वास से वायु उत्पन्न हुई।

(14) उसकी नाभि से वायु निकली, उसके मस्तक से आकाश, उसके चरणों से

धरती, उसके कानों से चार दिशाएं बनीं। इस तरह देवताओं ने इस ब्रह्मांड

की रचना की।

(15) जब देवताओं ने यज्ञ करते हुए पुरुष को यज्ञ की बलि के रूप में बांधा तो

उस यज्ञ की हवि के चारों ओर सात लकडि़यां बांधीं और तीन बार सात-सात

लकडि़यों की अग्नि लगाई।

(16) इस प्रकार यज्ञ में देवताओं ने आहुतियां दीं। यह प्रथम अनुष्ठान था। इन

शक्तियों ने आकाश से कहा कि पूर्व साद्य देव कहां हैं?

पुरुष सूक्त विश्वोत्पत्ति का आगम सिद्धांत है। दूसरे शब्दों में यह विश्वात्पत्ति शास्त्र है। किसी भी विकसित सभ्य देश में विश्व की उत्पत्ति का वर्णन किसी न किसी प्रकार अवश्य मिलता है। मिस्र वासियों का विश्वोत्पत्ति शास्त्र लगभग पुरुष सूक्त के समान ही

ऽ एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन एंड इथिक्स, खंड चार, पृ. 145