अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 28

शूद्रों की गूढ़ समस्या

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है। उसके अनुसारऽ देवता रचनाकार खुनूमू ने विश्व की उसी प्रकार जिस प्रकार कुम्हार चाक पर बर्तन बनाता है। विश्व की रचना की जो सब विद्यमान है। वह पिताओं का पिता और माताओं की माता है।

उसने मानव और देवगण पैदा किए। वह स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, जल, पर्वत का निर्माता है उसी ने सभी पक्षियों, मछलियों, जंगली पशुओं और अन्य कीड़े-मकोड़ों का नर और मादा के रूप में सृजन किया।

बाइबिल के प्रथम अध्याय में भी लगभग इसी प्रकार का विश्व रचना के सिद्धांत का उल्लेख है।

विश्वोत्पत्ति का विषय सिर्फ शैक्षिक रूचि के संदर्भ में विद्यार्थियों की उत्कंठा शांत करने और बच्चों के मन बहलाव का साधन बनने से अधिक और कुछ नहीं हो सकता। यह बात समस्त पुरुष सूक्त पर तो नहीं परंतु उसके कुछ भागों पर अवश्य लागू होती है। इसीलिए पुरुष सूक्त के सभी मंत्र न तो समान रूप से महत्वपूर्ण है और न ही उनकी एक समान महत्ता है। मंत्र 11 और 12 एक ही श्रेणी के हैं और शेष मंत्र दूसरी श्रेणी के हैं। मंत्र 11 और 12 को छोड़कर शेष मंत्रों को शास्त्रीय महत्व का माना जा सकता है न तो कोई उन पर विश्वास करता है न ही हिंदू उन्हें याद करता है। लेकिन मंत्र 11 और 12 के विषय में ऐसा नहीं है। प्रत्यक्षतः ये मंत्र सिवाय इसके कुछ नहीं बताते कि चातुर्वर्ण्य अर्थात ब्राह्मण या पुजारी, क्षत्रिय या सिपाही, वैश्य या व्यापारी और शूद्र अथवा नीच उत्पत्ति सृजनकर्ता के शरीर से किस प्रकार हुई, तथ्य तो यह है कि इन मंत्रों को ब्रह्मांड की अद्भुत घटना की व्याख्या के रूप में ही नहीं समझा जाता है। यह स्वीकार कर लेना भयकर भूल होगी कि वे भारतीय आर्यों द्वारा केवल रचनात्मक की सहज काव्य कल्पना ही माने गए हैं। वे सृजनकर्ता के उस अनिर्वाच निर्देश के रूप में माने गए हैं जिसमें कि पुरुष सूक्त में वर्णित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को सामाजिक संरचना माना जाए। पुरुष का यही कथ्य है। इन मंत्रों की रचना में प्रयुक्त भाषा न्यायसंगत नहीं है। परंतु यह सत्य है कि परंपरा के अनुसार मंत्रों की ऐसी व्याख्या की जाती है। फिर भी यह कहना कठिन है कि पारंपरिक मंत्र रचना पुरुष सूक्त के सृजनकर्ता के आशय अर्थ के अनुरूप नहीं है। पुरुष सूक्त के मंत्र 11 और 12 विश्वोत्पत्ति का वर्णन मात्र नहीं है। वे समाज के विशेष विधान (चातुर्वर्ण्य व्यवस्था) का ईश्वरीय आदेश है।

पुरुष सूक्त द्वारा निर्धारित समाज के गठन को चातुर्वर्ण्य व्यवस्था कहा गया है। ईश्वरीय आदेश के रूप में ही यह भारतीय आर्यों के समाज का आदर्श बन गया। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का यह आदर्श भारतीय आर्य समुदाय का आरंभिक समाज इसी सांचे में ढल गया जिसमें भारतीय आर्य समुदाय का एक विचित्र और विशेष स्वरूप बना।

भारतीय आर्य समाज द्वारा शिरोधार्य चातुर्वर्ण्य की आदर्श व्यवस्था उनके लिए न