14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
केवल असंदिग्ध ही है बल्कि यह अवर्णनीय भी है। इसका भारतीय आर्य समाज पर गहरा और अकाट्य प्रभाव रहा है। पुरुष सूक्त द्वारा प्रतिपादित सामाजिक व्यवस्था पर भगवान बुद्ध के अतिरिक्त किसी और ने सवाल तक नहीं उठाया है। वैसे भगवान बुद्ध भी उस व्यवस्था को हिला तक नहीं पाए थे क्योंकि बुद्ध के समय में और बौद्ध धर्म के पतन के बाद अनेक स्मृतिकारों ने पुरुष सूक्त के सिद्धांतों की रक्षा को न केवल अपना व्यवसाय बनाया अपितु उन्होंने उसका जमकर प्रचार भी किया।
पुरुष सूक्त के समर्थन में इस प्रकार का उदाहरण आपस्तम्ब धर्मसूत्र और वशिष्ठ धर्म सूत्र में मिलता है। आपस्तम्ब धर्म सूत्र में कहा गया हैःµ
जातियां चार हैं -
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र
इन चारों में प्रत्येक पहली जाति क्रमशः दूसरी सभी जातियों से श्रेष्ठ हैं। ख्1,
शूद्रों और निकृष्ट कार्य करने वालों को छोड़कर सभी को (1) उपनयन (2) वेदाध्ययन करने तथा (3) यज्ञ (बलि) अथवा पवित्र धागा यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार है। ख्2,
वशिष्ट धर्म सूत्र में इसे दोहराते हुए यह कहा गया हैः-
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और श्ूद्र चार जातियां (वर्ण) हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीनों जातियां द्विज हैं अर्थात दो बार जन्मी हैं। उनका प्रथम जन्म माता की योनि से होता है और दूसरा उपनयन अर्थात यज्ञोपवीत धारण करने से होता है। इस (दूसरे जन्म) में सावित्री को माता और गुरू को पिता माना गया है।
शिक्षक (गुरू) वेदों की शिक्षा देता है, इसलिए उसे पिता कहा जाता है। ख्3, चारों जातियां जन्म और संस्कार से भिन्न-भिन्न हैं।
वेद का एक वाक्य यह भी हैः- ‘‘ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय भुजा से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र पैरों से पैदा हुए।’’ इस वाक्य में यह घोषणा की गई कि ‘‘शूद्र यज्ञोपवीत संस्कार के अधिकारों को प्राप्त नहीं करेगा।’’ अन्य अनेक शास्त्रकारों ने भी पुरुष सूक्त का तोतारटंत पाठ दोहराया और उसकी पवित्रता को जारी रखा। उनकी पुनरोक्ति अनावश्यक है। जिन विद्वानों ने पुरुष सूक्त में निर्धारित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का विरोध किया, उन्हें हिंदू समाज के शिल्पी मनु ने सदा के लिए दबा दिया। मनु ने दो कार्य किए। सर्वप्रथम उसने पुरुष सूक्त के आदर्श को ईश्वरीय आज्ञा के रूप में नए सिरे से
प्रश्न 1, पटल 1, खंड 1, सूत्र 4-5
प्रश्न 1, पटल 1, खंड 1, सूत्र 6
मनु अध्याय 2 श्लोक 1-4