अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 31

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

पर जब इसके अनुपम होने के सही कारण का पता चलेगा तो लोगों को इसमें संकोच नहीं होगा कि ‘‘पुरुष सूक्त’’ की विचित्रता और अनूठापन मानवता और मानव-जाति के प्रति कितना बड़ा प्रपंच है।

पुरुष सूक्त की सामाजिक आदर्श की विशेषताएं क्या हैं, जो इसकी अनुपमता के प्रमाण हैं? यद्यपि वर्ण व्यवस्था का अस्तित्व वस्तुतः प्रत्येक समाप्त की अनिवार्य शर्त है फिर भी किसी समाज ने भी वास्तुविक स्वरूप को समाज के विधान के रूप में नहीं बदला। पुरुष सूक्त ही ऐसा उदाहरण है जिसमें वर्ण-भेद को समाज का आदर्श बताया गया है। ‘‘पुरुष सूक्त’’ में प्रतिपादित यह पहली अनुपम योजना है। दूसरे, किसी भी समुदाय ने समाज के आदर्श के व्यावहारिक भेदभाव को वैधानिक स्वरूप प्रदान नहीं किया। यूनान का उदाहरण सामने है। अफलातून (प्लेटो) जैसे महान विद्वान ने वर्ण व्यवस्था को आदर्श सामाजिक ढांचा माना। किन्तु वहां के लोगों ने वर्ण व्यवस्था को एक वास्तविक वैधानिक सामाजिक संरचना नहीं माना। ‘‘पुरुष सूक्त’’ ही एक ऐसा उदाहरण है जिसने वर्ण व्यवस्था को कानूनी जामा पहना कर उसे वास्तविक बनाने का प्रयास किया और उसे प्राकृतिक माना।

तीसरे, किसी भी समाज ने वर्ण व्यवस्था को सामाजिक विधान न मानकर प्राकृतिक विकास ही माना है। इससे भी आगे ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने वर्ण भेद को समाज का विधान और प्राकृतिक तो माना ही है उसे पावन और ईश्वरीय आदेश कह कर स्थापित्व भी प्रदान किया है। चौथे, इतिहास साक्षी है कि किसी समाज में जन श्रेणियों की संख्या निश्चित नहीं थी। रोम दो वर्गों में विभाजित था। मिस्र में तीन जन श्रेणियां थीं। भारतीय-ईरानी भी तीन जातियों (1) ख्1, अथर्वस (पुरोहित), (2) रथेस्तर (सैनिक), और (3) वस्त्र फश्युत (कृषक) तक जाकर रह गए। किन्तु ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने समाज को चार वर्णों में विभाजित किया, जो न तो घट सकती है और न बढ़ सकती है। पांचवें, प्रत्येक समाज में कोई जन-श्रेणी अपने महत्व के आधार पर देशकाल और परिस्थिति के अनुसार अपना स्थान बनाती है। किसी समाज ने श्रेष्ठता और हीनता का कोई अटल पैमाना और बंधन निश्चित नहीं किया है। किन्तु ‘‘पुरुष सूक्त’’ इस संबंध में सबसे अनुपम है, क्योंकि उसने विभिन्न जन श्रेणियों को सदा-सदा के लिए ऊंच-नीच के आधार पर एक स्थान पर निर्धारित कर दिया है। असमानता के सिद्धांत पर आधारित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में ब्राह्मण का स्थान सर्वोपरि है। क्षेत्रीय ब्राह्मण के नीचे किन्तु वैश्य और शुद्र के ऊपर होता है। वैश्य, ब्राह्मण और क्षत्रिय के नीचे शूद्र से ऊपर आता है। शूद्र सबसे नीचे है।

III

इन वास्तविक कारणों से ‘‘पुरुष सूक्त’’ अनुपम है। परंतु ‘‘पुरुष सूक्त’’ मात्र अनुपम

  1. गीजरः सिविलाईजेशन आफ द ईस्टर्न इरानियंस इन एंसिएंट टाइम्स, खंड 2, पृष्ठ 64