शूद्रों की गूढ़ समस्या
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ही नहीं, असाधारण भी है क्योंकि यह गूढ़ रहस्यों से भरा पड़ा है। अपूर्वता और अनुपमता का ज्ञान केवल कुछ लोगों को ही है। किन्तु जानने का प्रयास करने पर इन रहस्मय पहेलियों के वास्तविक स्वरूप और मायाजाल का पता चलेगा। ‘‘पुरुष सूक्त’’ में प्रतिपादित विश्वोत्पत्ति का सिद्धांत ऋग्वेद में भी मिलता है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के 72वें मंत्र में विश्वोत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार हैःµ ख्1,
- आओ, देवों की उत्पत्ति का उच्च स्तर से यशोगान करें। स्तुति गान से वे भक्तों
पर प्रसन्न होते हैं।
- वृहस्पति ने देवताओं को लोहार की धौंकनी की भांति अपनी श्वास क्रिया से
फुला दिया। देवताओं के प्रथम युग में सृष्टि की रचना शून्य से हुई।
- देवताओं के प्रथम युग में सृष्टि शून्य से उत्पन्न हुई। इसके पश्चात क्षितिज
का जन्म हुआ और फिर ऊपर की ओर बढ़ने वाले वृक्ष पैदा हुए।
- ऊपर की ओर बढ़ने वाले वृक्षों से पृथ्वी पैदा हुई, पृथ्वी से दिशाओं का जन्म
हुआ। दक्ष का जन्म अदिति से और फिर अदिति का जन्म दक्ष से हुआ।
- हे दक्ष, फिर तेरी पुत्री अदिति का जन्म हुआ। इसके बाद पूजनीय और अविनाशी
देवगण पैदा हुए।
- हे देवजन, जब तुमने सुव्यवस्थित कक्ष में निवास किया तो तुम्हारे शरीर से
धूल उड़ी, मानो तुम नृत्य कर रहे हों।
- हे देवगण, जब तुम विश्व पर घटाओं की भांति छा गए तो तुमने समुद्र के
गर्भ से सूर्य को उत्पन्न किया।
- अदिति के शरीर से आठ पुत्र पैदा हुए। उसने सात पुत्रों के साथ देवताओं से
भेंट की और मार्तंण्ड (अष्टम पुत्र) को उच्च स्थान पर आसीन किया।
- सात पुत्रों के साथ अदिति पूर्व पीढ़ी के देवताओं के पास चली गई किन्तु
उसने मार्तंण्ड को मानव उत्पत्ति हेतु धारण किया।
विश्वोत्पत्ति के दोनों सिद्धांत विस्तार और मूल रूप में नितांत भिन्न हैं। पहले सिद्धांत के अनुसार विश्वोत्पत्ति शून्य से हुई जबकि दूसरे सिद्धांत के अनुसार पुरुष से हुई। यहां यह प्रश्न उठता है कि एक ही ग्रंथ में विश्वोत्पत्ति के दो परस्पर विरोधी सिद्धांत क्यों दिए गए हैं? ‘‘पुरुष सूक्त’’ के लेखक ने सृष्टि का आधार पुरुष को क्यों बनाया और संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति उससे हुई बताई?
‘‘पुरुष सूक्त’’ के अध्ययन से पता चलता है कि विश्व का प्रारंभ गधे, घोड़े,
- विल्सन-ऋग्वेद खंड 6, पृष्ठ 129