अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 33

18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

बकरी आदि की उत्पत्ति से होता है, किन्तु मानव उत्पत्ति का उसमें कोई उल्लेख नहीं है। जब पुरुष की सृष्टि की बात करना स्वाभाविक लगता है इसके विपरीत ‘‘पुरुष सूक्त’’ का रचनाकार क्रम भंग कर आर्यों के समाज में वर्णों की उत्पत्ति की विवेचना करने लगता है। इससे ऐसा आभास होता है कि ‘‘पुरुष सूक्त’’ का मूल उद्देश्य ही वर्ण भेद व्यवस्था का वर्णन मात्र है। ऐसा करने से ‘‘पुरुष सूक्त’’ ऋग्वेद के अन्य भागों से पूर्णतः विपरीत प्रकट होता है।

किसी भी धर्म ज्ञान ने समाज में श्रेणियों की उत्पत्ति को स्पष्ट करना अपना ध्येय नहीं बनाया है। बाइबिल का ओल्ड टेस्टामेंट में उत्पत्ति के प्रथम अध्याय में जिस अर्थ और आशय की दृष्टि से ‘‘पुरुष सूक्त’’ के समान बात कही है उसमें मानव उत्पत्ति का वर्णन है। इसका यह अर्थ नहीं है कि प्राचीन काल में यहूदियों में वर्ग नहीं थे। वर्ग सभी समाजों में विद्यमान थे। भारतीय आर्य भी इसका अपवाद नहीं हैं। फिर भी किसी भी धर्म ग्रंथ में वर्गों की उत्पत्ति की व्याख्या करना आवश्यक नहीं समझा गया है तो फिर ‘‘पुरुष सूक्त’’ में सामाजिक वर्गों की उत्पत्ति की व्याख्या करना प्रथम लक्ष्य क्यों बनाया गया?

ऋग्वेद में ‘‘पुरुष सूक्त’’ ही कोई एक स्थान नहीं है जिसमें सृष्टि की रचना का जिक्र है बल्कि अन्य स्थलों पर भी उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। इस संबंध में ऋग्वेद की निम्न ऋचाओं का अवलोकन किया जाता है। ख्1,

‘‘ऋग्वेद, 96.2, ‘‘प्रथम निविड़’’ और ‘‘वायु’’ के ज्ञान से उस (अग्नि) ने मानव संतति को उत्पन्न किया। उस ‘‘अग्नि’’ ने अपने प्रकाश से पृथ्वी और सागर का सृजन किया। देवताओं ने अग्नि को धन का दाता बताया।’’

इस मंत्र में समाज के वर्णों के पृथक सृजन का कोई उल्लेख नहीं है, यद्यपि यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक काल में ही भारतीय आर्य समुदाय का वर्गीकरण हो चुका था, तथापि ऋग्वेद का यह मंत्र वर्ग रचना की उपेक्षा कर मानव रचना की ही बात कहता है। फिर क्या कारण है कि ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने मानवोत्पत्ति के अतिरिक्त वर्ग रचना के वर्णन को महत्व दिया है?

‘‘पुरुष सूक्त’’ ऋग्वेद का और तरीके से विरोध करता है। ऋग्वेद भारतीय आर्यों की उत्पत्ति के विषय में निष्पक्ष मत प्रतिपादित करता है, जैसा कि निम्नलिखित मंत्रों से स्पष्ट हैःµ

  1. ऋग्वेद i. 80.16ः अर्थात, पिता मनु और दध्यांच एकत्र होकर उन्होंने प्रार्थना

की और मंत्र पढ़े तथा एक उत्सव संपन्न कर इंद्र की अर्चना की। ख्2,

  1. ऋग्वेद i. 114,2ः हे रुद्र पिता मनु ने यज्ञ से जो समृद्धि और शक्ति प्राप्त

की तेरे मार्ग दर्शन में हम सब इसका उपयोग करें। ख्3,

  1. म्यूर खंड, प्रथम, पृष्ठ 180

  2. वही, पृष्ठ 162

  3. वही, पृष्ठ 163