20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
पुरुष सूक्त के रचियता इस बात के अपवाद लगाते हैं कि स्वयंभू मनु विरज (वीर्य) है और विरज आदि पुरुष है ख्1,, क्योंकि वह भी अपने सूक्त के पांचवे मंत्र में विरज आदि पुरुष कहते हैं।
तीसरा तर्क भी है जिसके अनुसार पुरुष सूक्त ऋग्वेद से भी आगे चला जाता है। वैदिक आर्य सभ्यता की दृष्टि से बहुत विकसित थे जिससे उन्होंने कार्य के विभाजन के सिद्धांत को स्वीकार किया। उन्होंने आजीविका के लिए भिन्न-भिन्न साधन अपनाए। इसका उन्हें पूरा ज्ञान था, जो इस मंत्र में प्रकट होता हैःµ
ऋग्वेद I 113.6ः ‘‘कुछ व्यक्ति शक्ति की खोज में जाते हैं, कुछ यश की, कुछ धन की संपत्ति की खोज में जाते हैं और कुछ आजीविका की खोज में। ऊषा ने लोगों को जागृत किया कि वे अपनी विशिष्ट और भिन्न-भिन्न आजीविका की खोज में जाएं।’’
ऋग्वेद में इतना ही कहा है कि लेकिन पुरुष सूक्त और आगे जाता है। यह श्रम के विभाजन के सिद्धांत का पालन करता है और श्रम के विभाजन के योजना को लोगों के व्यवसाय के विभाजन की योजना में बदलता है तथा उसे निश्चित और स्थायी व्यावसायिक वर्गों में विभाजित करता है। ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने इतनी विकृति क्यों की?
‘‘पुरुष सूक्त’’ का ऋग्वेद से भिन्न होने का एक कारण यह भी है कि ऋग्वेश केवल मानव की बात करता है। भारतीय आर्य जाति की भी बात कहता है जो पांच कबीलों के समन्वय से बनी है जो भारतीय कबीले आर्य जन में एकीकृत होकर एक समान जाति बन गई। ये पांच कबीले एक कैसे हुए वह इन मंत्रों से स्पष्ट होता हैःµ
- ऋग्वेद VI. 11.4ः पांचों कबीले, समवेत अग्नि में आहुति दे रहे हैं, स्तुति
कर रहे हैं और दंडवत हो रहे हैं मानो अग्नि मनुष्य है। ख्2,
- ऋग्वेद VII. 15.2ः गृह का ज्ञानी और युवा स्वामी (अग्नि) जो पांचों कबीलों
के घरों में विद्यमान है। ख्3,
ये पांचों कबीले कौन से है, इस पर मतभेद है। यास्क ने निरुक्त में इनके नाम गंधर्व, पितृ, देव, असुर और राक्षस बताए हैं। उपमन्यु के अनुसार इन कबीलों से चार वर्ण और निषाद का अभिधान होता है। ये दोनों ही मत गलत लगते हैं। पहले तो इसलिए कि पांचों कबीलों की एक साथ प्रशंसा की गई है जो निम्न मंत्रों से स्पष्ट हैःµ
मत्स्य पुराण म्यूर खंड 1, पृष्ठ 111 एफ एन
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 177
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 178