अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 36

शूद्रों की गूढ़ समस्या

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  1. ऋग्वेद II. 2.10ः हमारा शौर्य पांचों कबीलों में स्वर्ण कर भांति ज्योतिर्मय

हो। ख्1,

  1. ऋग्वेद VI. 46.7ः हे इंद्र जो बल और पौरूष नहुष वंश और पांचों कबीलों

में है, वह हम सबको प्रदान करों। ख्2,

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि इन पांचों कबीलों में शूद्र शामिल होते तो निश्चय ही इनकी एक साथ प्रशंसा न की जाती। फिर ‘‘वर्ण’’ शब्द का प्रयोग न कर ‘‘जन’’ शब्द का प्रयोग किया गया है और ‘‘जन’’ का अर्थ पांचों कबीलों के सम्मिलित रूप का पर्याप है न कि चार वर्णों और निषाद का जैसा कि ऋग्वेद के निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट हैःµ

ऋग्वेद, I, 108.8ः हे इंद्र, हे अग्नि, यदि तुम्हारा निवास यदु, तर्वस, द्रहयु, अनु और पुरू में है, तो हे वीर चंहु ओर से आकर सोमरस का पान करो। ख्3,

इन्हीं पांच कबीलों से एक आर्य जाति बनी। यह अथर्ववेद के मंत्र ( III. 24.2) से स्पष्ट हैःµ

‘‘ये पांच क्षेत्र पांच कबीले, मनु से उत्पन्न हुए हैं।’’

एकता और चेतना की भावना से ही यह स्पष्ट किया जा सकता है कि ऋग्वेद के मंत्र सृष्टाओं और ऋषियों ने पांच कबीलों का ऐसा क्यों उल्लेख किया। प्रश्न उठते हैं, ‘‘पुरुष सूक्त’’ पांचों कबीलों की एकनिष्ठा को मान्यता क्यों नहीं देता? इसके बजाए वह कबीलों के भीतर ही सामाजिक विभाजन को क्यों मान्यता देता है? ‘‘पुरुष सूक्त’’ जातीयता की तुलना में सांप्रदायिवाद को अधिक महत्व क्यों देता है?

‘‘पुरुष सूक्त’’ की ऋग्वेद के साथ तुलना करने पर ‘‘पुरुष सूक्त’’ की कुछ पहेलियां प्रकाश में आती हैं। ‘‘पुरुष सूक्त’’ की समाज शास्त्रीय भीमांसा करने पर कुछ और रहस्य प्रकट होते हैं।

आदर्शों का अस्तित्व नियमों के रूप में आवश्यक है। कोई समाज अथवा व्यक्ति नियमों के बिना उन्नति नहीं कर सकता। समय और परिस्थितियों के अनुसार नियमों में परिवर्तन होना चाहिए। अतः कोई नियम स्थायी रूप से निश्चत नहीं है। नियमों के मूल्य का पुनर्मूल्यांकन करने की गुंजाइश रहनी चाहिए। मूल्यों का पुनर्मूल्यन तभी संभव है जब इन्हें पवित्रता का अवरण न दिया जाए। पवित्रता का आवरण मूल्यों की पुनरीक्षा में बाधा डालना है। एक बार पवित्रता स्थायी बन जाती है। ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने इसी प्रकार चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था को पवित्रता और विधि के विधान की संज्ञा देकर उसे स्थायित्व

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 178

  2. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 180

  3. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 179