अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 37

22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

प्रदान किया है। ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने विशेष प्रकार की व्यवस्था को आलोचना से परे और अपरिवर्तनीय बना कर इसे इतना पवित्र बनाकर स्थायी क्यों बनाया? यह ‘‘पुरुष सूक्त’’ की पहली पहेली है जिसका उत्तर समाज शास्त्र का विद्यार्थी चाहता है।

चातुर्वर्ण्य का सिद्धांत प्रतिपादित करने में ‘‘पुरुष सूक्त’’ ने दोहरी चाल चली है। प्रारंभ में वह भारतीय आर्य समुदाय की वर्ण व्यवस्था के अस्तित्व को वास्तविक और आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है। यह धोखा है, क्योंकि यह आदर्श वास्तविकता से भिन्न नहीं है। वास्तविकता को आदर्श के स्तर तक ऊंचा उठाने के बाद उसे ऐसा प्रस्तुत करने का प्रयास करता है माना यह आदर्श ही है। यह फिर धोखा है, क्योंकि आदर्श तो वास्तवकिता में पहले वि विद्यमान है। ‘‘पुरुष सूक्त’’ द्वारा वास्तविकता को आदर्श और आदर्श को वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत करना राजनीतिक इंद्रजाल या चाल है। मेरा अपना विश्वास है कि यह एक प्रकार का छल है। ऐसा प्रपंच विश्व के किसी अन्य धर्म ग्रंथ में नहीं है। यह छल कपट के सिवाय और क्या है? अन्याय और असमानता से युक्त वास्तविकता को आदर्श का रूप देना स्वार्थ सिद्धि के सिवाय अन्य कुछ नहीं है। जब किसी व्यक्ति को किसी बात में लाभ दिखाई देता है, वह उसे आदर्श का रूप देने की चेष्टा करता है। यह अपराध वृत्ति से कम नहीं है। इस प्रकार एक बार स्थापित की गई असमानता स्थायी हो जाती है। यह धारणा नैतिकता के विरूद्ध है। किसी भी प्रबुद्ध समाज ने इस प्रकार के किसी मत को न तो स्वीकार किया और न मान्यता ही प्रदान की है। इसके विपरीत इतिहास साक्षी है कि आज तक व्यक्तियों और वर्गों के संबंध सुधार में जो प्रगति हुई है वह इस नैतिक सिद्धांत की मान्यता के कारण हुई है कि गलती से जो स्थापित हो गया वह कभी स्थापित नहीं होना चाहिए और उसकी पुर्नसंरचना की जानी चाहिए। अतः इस दृष्टि से ‘‘पुरुष सूक्त’’ का सिद्धांत आशय से आपराधिक और परिणाम से समाज विरोधी है।

वर्ण विशेष को अनुचित ढंग से लाभ पहुंचाना और दूसरे को अन्यायपूर्ण एवं अनुचित रूप से दबाए रखना ‘‘पुरुष सूक्त’’ का उद्देश्य समाज विरोधी है। यह दूसरी पहेली है। इन सभी पहेलियों का अंतिम और सबसे बड़ा रहस्य ‘‘पुरुष सूक्त’’ की समाज शास्त्रीय समीक्षा से उभरता है, जो शूद्रों की स्थिति के संबंध में है। ‘‘पुरुष सूक्त’’ वर्णोत्पत्ति ईश्वर कृत बताता है कि ऐसा सिद्धांत प्रतिपादित करना किसी भी धर्मदर्शन ने न्यायसंगत नहीं माना। यह पुरुष सूक्त का सिद्धांत विचित्र है। भिन्न-भिन्न वर्णों की उत्पत्ति विधाता के भिन्न-भिन्न अंगों से होना तो और भी विचित्र बात है शरीर के विभिन्न अंगों से विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति का समीकरण संयोगमात्र नहीं है। यह जानबूझ कर किया गया है। इस समीकरण की पृष्ठभूमि से छिपा मूल उद्देश्य दो समस्याओं (1) चारों वर्णों के कार्य (आजीविका के साधन) निश्चित करना तथा (2) पूर्व निश्चित योजना के अंतर्गत चारों वर्णों को श्रेणीबद्ध करना है। विधाता के भिन्न-भिन्न अंगों से विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति