अध्याय 1. शूद्रों की गूढ़ समस्या - Page 38

शूद्रों की गूढ़ समस्या

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का समीकरण करने से इस सूत्र से लाभ मिलता है। शरीर का एक निश्चित भाग एक वर्ण की श्रेणी और उसका कार्य निर्धारित करता है। ब्राह्मण की उत्पत्ति विधाता के मुख से कही गई है। चूंकि मुख और शरीर का सर्वोत्तम अंग है, अतः ब्राह्मण चारों वर्णों में श्रेष्ठतम वर्ण बन गया है। इसके आधार पर उसे श्रेष्ठ कार्य सौंपा गया है। उसे योग्यता और ज्ञान (पाठ-पाठन) के अभिरक्षक पद का अधिकार सौंपा गया है। क्षत्रिय का जन्म विधाता की बाहों से हुआ बताया गया है। बाहें शरीर में मुख से नीचे आती हैं इसलिए क्षत्रिय को बुद्धि के बाद का काम युद्ध सौंप दिया गया है। वैश्व जंघाओं से जन्म लेने के कारण ब्राह्मण और क्षत्रिय से नीचा है। अतः उसे कृषि और व्यवसाय के काम में लगाया गया है। शूद्र की उत्पत्ति विधाता के पैरों से हुई है! वह शरीर का निम्नतम अंग है। अतः शूद्र का स्थान चारों वर्णों में सबसे नीचे है और उसका कार्य भृत्य वृत्ति निश्चित किया गया है।

‘‘पुरुष सूक्त’’ ने चारों वर्णों की उत्पत्ति के लिए ऐसी व्यवस्था करने का तरीका क्यों चुना? उसने शूद्र को चरण के समान क्यों बताया? उसने चारों वर्णों की उत्पत्ति का कोई अन्य उदाहरण क्यों नहीं दिया? उत्पत्ति के उद्देश्य से पुरुष ही एकमात्र उपमा नहीं है। छांदोग्य उपनिषद में वेदों की उत्पत्ति के स्पष्टीकरण की तुलना करें। उसमें कहा है ख्1, ःµ

प्रजापति ने ब्रह्मांड को गर्म करके उसमें से चार तत्व निकाले अर्थात पृथ्वी से अग्नि, हवा से वायु और आकाश से सूर्य निकले। उस प्रजापति ने फिर तीन आराध्य देवों को गर्म किया जिसके सार स्वरूप अग्नि से ऋग्वेद की ऋचाएं,वायु से यतुर्वेद के मंत्र और सूर्य से सामवेद की ऋचाएं पैदा कीं। उसने इन तीनों (वेंदों) को गर्म किया और इस तरह गर्म हुए वेदों के उत्पन्न तत्व से ऋग्वेद की ऋचाओं से यर्जुवेद के मंत्रों से ‘‘भुव’’, और सामवेद के ‘‘स्वर’’ शब्दों की रचना की।

इस प्रकार विभिन्न वेदों की उत्पत्ति विविध आराध्य देवों से बताई गई है। जहां तक भारतीय आर्यों का संबंध है, उनसे देवी देवताओं की संख्या किसी प्रकार कम न थी। तीस करोड़ देवता थे। चार देवों से चार वर्णों की उत्पत्ति के आधार पर उन्हें जन्म से ही समानता और आदर मिलना चाहिए था। किन्तु ‘‘पुरुष सूक्त’’ में इस प्रकार की व्याख्या क्यों नहीं की?

फिर क्या पुरुष के विभिन्न मुखों से विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति बताना ‘‘पुरुष सूक्त’’ के रचनाकार के लिए संभव नहीं था? इस तरह की संकल्पना मुश्किल न थी क्योंकि ‘‘पुरुष सूक्त’’ के पुरुष से सहस्त्र सिर होने के कारण उसके एक-एक मुख से एक-एक वर्ण की उत्पत्ति तो और भी सरलतापूर्वक दर्शायी जा सकती थी। उत्पत्ति की व्याख्या की इस रीति से ‘‘पुरुष सूक्त’’ का लेखक अनजान नहीं था। इसका कारण यह है कि विष्णु पुराण

  1. म्यूर खंड तीन, पृष्ठ 5