24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
में वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या के इस ढंग को प्रयोग में लाया गया है। ख्1, देखिएः-
‘‘ब्रह्मा के पूरब की दिशा के मुख से गायत्री, ऋग्वेद की ऋचाएं, त्रिवृत्त सामवेद के रथांतर और यज्ञ के लिए अग्निस्तोम निकले, दक्षिण दिशा के मुख से यजुर्वेद के मंत्र, ट्रिष्टुभ छंद, पंचदश स्तोम, बृहत्तम और अकथ्य, पश्चिम दिशा के मुख से सामवेद के मंत्र, जगती छंद, सप्तदश स्तोम, वैरूप और अतिरात्र तथा उत्तर दिशा के मुख से एकविंश, अथर्वन, अनुष्ठुप और विरज छंदों के साथ अप्तोर्ममन निकलें।’’
हरिवंश पुराण के वेदों की रचना का कुछ और ही वर्णन हैः- ‘‘ईश्वर ने अपने नेत्रों से ऋग्वेद और यजुर्वेद, जिव्हा से सामवेद और ललाट से अथर्वदेव की रचना की। ख्2, ’’
यदि हम यह मान लें कि ‘‘पुरुष सूक्त’’ के रचनाकार के लिए किसी कारण विधाता के विभिन्न अंगों से विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति दर्शाना आवश्यक ही था, तब यह प्रश्न उठता है कि पुरुष के विभिन्न अंगों से विभिन्न वर्णों की समानता अपनी इच्छा के अनुसार क्यों स्थापित की?
इस प्रश्न का महत्व उस समय और बढ़ जाता है जब यह पता चलता है कि विधाता के विभिन्न अंगों से विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति स्थापित करने का उदाहरण मात्र ‘‘पुरुष सूक्त’’ ही नहीं है। वैशम्पायन मुनी ने यज्ञ कराने वाले पुरोहितों के विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन शरीर के विविध अंगों से किया है। किन्तु दोनों में कितना अंतर है। वैशम्पायन ने हरिवंश पुराण में यह व्याख्या इस प्रकार प्रस्तुत की हैं ख्3, ः-
‘‘इस प्रकार तेजस्वी भगवान नारायण हरि सातों समुद्रों को अपनी शक्तिशाली बाहों के घेरे में लेकर रजो के विराट विस्तार जो एक महासमुद्र के समान हो गया था, के मध्य भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों से विभूषित होकर विरज मुक्त हो सो गए। ब्राह्मण उनकी अनश्वरता को जानते हैं। पुरुषोत्तम (विष्णु)’’, वह जो भी हो, सर्वोच्च है। पुरुष के नाम से ज्ञात सब यज्ञ है। ऋत्विज ब्राह्मण उसके अंगों से यज्ञ कार्य के लिजए पैदा हुए हैं। प्रभु ने अपने मुख से ब्राह्मण जो मुख्य पुरोहित हैं और सामवेद के मंत्रों के उच्चारण ‘‘उदगात’’, बाहों से ‘‘होतृ’’ एवं ‘‘अध्वर्यु’’ की उत्पत्ति की। तदनुपरांत उसने ‘‘प्रस्त्रोतृ’’, ‘‘मैत्रकरूण’’, ‘‘प्रतिष्ठातृ’’, प्रतिह, पोतृ अपने उदर से, जंघाओं से अक्ष्वाक और नेस्तृ, हाथों से अग्निघ्र और होत्रिय ब्राह्मण, बाहों से ग्रवण तथा अन्नेतृ उत्पन्न किए। इस प्रकार ईश्वर ने सोलह प्रवीण ऋत्विज पैदा किए जो सभी बलि के मंत्रों का पाठ करते थे। इसलिए यज्ञ रचित पुरुष को वेद कहा जाता है। सभी वेदों, वेदांगों, उपनिषदों और धर्म व्यवहार विधि की रचना उसके सार से हुई है।’’
म्यूर खंड तीन, पृष्ठ 11
वही, पृष्ठ 13
म्यूर खंड एक पृष्ठ 154-155