अध्याय 2. शूद्रों की उत्पत्ति का ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 44

शूद्रों की उत्पत्ति का ब्राह्मणवादी सिद्धांत

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वह उसे ऐंद्र ब्राह्मणस्पतय आहुतियां दे। राजन्य इंद्र के समान है और ब्राह्मण बृहस्पति है। ब्राह्मण के माध्यम से ही कोई राजन्य को मुक्त कर सकता है। स्वर्ण बंधन रूपी उपहार स्पष्ट रूप से ऐसे बंधन से मुक्त करता है।’’

(2) तैत्तिरीय संहिता ( VII -1-14) ख्1, प्रजापति ने सृजन की इच्छा व्यक्त की। इसने अपने मुख से त्रिवत्त स्तोम की रचना की। इसके उपरांत अग्नि देव, गायत्री छंद, साम, स्थांतर, मानवों में ब्राह्मण और पशुओं में बकरा उत्पन्न किया। उनकी उत्पत्ति मुख से हुई है, अस्तु प्रमुख हैं। उसने अपने वक्ष से और बाहुओं से पंचद की रचना की। इसके बाद देवों में इंद्र, छंदों में त्रिष्टुम, साम में बृहत, मानवों में राजन्म और पशुओं में मेष पैदा किए। ये शक्तिशाली अंगों से पैदा होने के कारण बलशाली है। उसने अपने मध्य से सप्तदश की रचना की। इसके पश्चात उसने देवों में विश्वदेव, छंदों में जगती, साम, वैश्व, मानवों में वैश्य और पशुओं में गाय को जन्म दिया। ये उदर से उत्पन्न होने के कारण योग्य है। इनके बहुसंख्यक होने के कारण सप्तदश के बाद अनेक वेदों को जन्म दिया। तदुपरांत उसने अपने पैरों से इक्कीस की रचना की, जिससे अनुष्टुभ छंद, साम, वेराज, मानवों में शूद्र और पशुओं में अश्व पैदा हुए। अतः शूद्र और अश्व जीवों के वाहक हैं। 21 के बाद किसी आराध्य को उत्पन्न नहीं किया गया। अतः शूद्र यज्ञ करने के अधिकार से वंचित हैं। अस्तु दोनों का जीवन भी पैरों (दास्ता) में ही व्यतीत होता है। तब भी शूद्र यज्ञ का पात्र नहीं। क्योंकि एकविंश के पश्चात कोई उत्पन्न नहीं हुआ। उनका स्थान चरणों में है क्योंकि उदगम चरण है।

अथर्ववेद में पुरुष सूक्त की तरह चार व्याख्याएं हैं। पहली ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के ( XIX -6) के समान है। दूसरी निम्न प्रकार हैःµ

  1. अथर्ववेद ( IV -6-1) ख्2, सर्वप्रथम ब्रह्मा का जन्म हुआ। उसके दस सिर और दस मुख थे। पहले उसने सोम रस का पान किया और विष को शक्तिहीन बनाया।

  2. अथर्ववेद ( XV -8-1) ख्3, ब्रत्य में काम जागा और राजन्य को जन्म दिया।

  3. अथर्ववेद ( XV -9-1) ख्4, ब्रत्य के परिचित राजा के घर पर अतिथि के रूप में आकर उस राजा को उसका ब्रत्य आदर करने को कहा। उस ब्रह्म ने उस (राजा) को इसका कारण समझाया। राजा द्वारा सम्मानित होने पर उस (ब्रत्य) ने उसका अहित नहीं किया। उससे ब्राह्मण और क्षत्रिय का उदय हुआ। उन्होंने कहां, हम अब उस में प्रवेश करेंगे इत्यादि।

  4. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 16

  5. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 21

  6. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 22

  7. म्यूर खंड 2, पृष्ठ 22