30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
II
अब ब्राह्मण ग्रंथों को लेते हैं। शतपथ ब्राह्मण में 6 व्याख्याएं मिलती हैं। इनमें से दो वर्णों को उत्पत्ति के विषय में है। उनमें से एक में शूद्रों की उत्पत्ति का निवारण इस प्रकार हैःµ
शतपथ ब्राह्ममण ख्1, ( XIV -4-2-23) ब्रह्मा (भाष्यकार के अनुसार उनका अग्नि का स्वरूप था और वे ब्राह्मण थे) ही पहले ब्रह्मांड थे, एकमेव थे। एक ही होने के कारण उनका विस्तार नहीं हुआ। उन्होंने पराक्रमपूर्वक क्षत्रिय का एक दिव्य रूप ग्रहण किया। देवताओं में वे शक्तिशाली हैं, (क्षत्रिय), इंद्र, वरूण, रुद्र, सोम, परजन्य, यम, मृत्यु, ईषान हैं। इस प्रकार क्षत्रिय से कोई श्रेष्ठ नहीं है। अतः ब्राह्मण राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय से नीचे बैठते हैं। वह क्षत्रिय की गरिमा को स्वीकार करते हैं। यही ब्रह्मा क्षत्रिय का उदगम है। यद्यपि राजा श्रेष्ठता को प्राप्त करता है, अंत में वह अपने उदगम के रूप में ब्राह्मण की शरण में आता है जो ब्राह्मण को नष्ट करता है वह अपने उदगम को भ्रष्ट करता है। वह अति दमनीय बन जाता है, मानों उसने अपने से श्रेष्ठ को आहत किया हो। उसका विकास नहीं हुआ। उसने ‘‘विश’’ उत्पन्न किया। देवताओं की इस श्रेणी में वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव मारूत आते हैं। उसका विकास नहीं हुआ। उसने शूद्र वर्ण पूषण उत्पन्न किया। यह पृथ्वी पूष्णा है क्योंकि वह सभी का पोषण करती है। उसका विकास नहीं हुआ। उसने शक्ति से एक विलक्षण रूप में उत्पन्न किया, न्याय (धर्म)। वह शासक (क्षत्रिय) है, अर्थात न्याय है। इस प्रकार न्याय से श्रेष्ठ कुछ नहीं। इसलिए निर्बल बलवान से त्राण के लिए न्याय मांगता है, जैसे एक राजा से। यह न्याय सत्य है। परिणाम स्वरूप वे ऐसे व्यक्ति के विषय में कहते हैं जो सत्य बोलता है, न्याय करता है, क्योंकि उसमें दोनों गुण हैं। यह ब्रह्मा, क्षत्रिय, विश और शूद्र है। अग्नि के माधयम से वह देवताओं में ब्रह्मा, मनुष्यों में ब्राह्मण (दैवी) क्षत्रिय के माध्यम से (मानव क्षत्रिय) बना। (दैवी) वैश्य से मानव (वैश्य) बना, शूद्र के माध्यम से मानव शूद्र बना। अतः वह देवताओं में अग्नि, मनुष्यों में ब्राह्मण है।’’
तैत्तिरीय ब्राह्मण में निम्नलिखित व्याख्या दी गई हैःµ
(1) तै. ब्रा. ख्2, ( I -2-6-7) - ब्राह्मण वर्ण देवों से प्रकट हुआ_ शूद्र असूरों से।
(2) तै. ब्रा. ख्3, ( III -2-3-9) - शूद्र का जन्म शून्स से हुआ है।
III
उपरोक्त उद्धरणों में चारों वर्ण तथा शूद्र की उत्पत्ति के संबंध में आख्यानों या परिकल्पनाओं के सार का संकलन है। प्राचीन काल मेंं ब्राह्मण यह भली भांति जानते
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 20
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 21
वही