शूद्रों की उत्पत्ति का ब्राह्मणवादी सिद्धांत
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थे कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था अस्वाभाविक और असामान्य सामाजिक व्यवस्था तो है ही, उसमें शूद्रों का स्थान और भी अप्राकृतिक और कृतिम है। इस कुटिल व्यवस्था को तर्क सम्मत सिद्ध करने के लिए ही समुचित विविध व्याख्यानों की आवश्यकता पड़ी, अन्यथा चातुर्वर्ण्य व्यवस्था और शूद्रों की उत्पत्ति के विषय में इतना अधिक औचित्य दिखाने का वर्णन मिलना असंभव ही होता।
इस कथनों के संबंध में क्या कहा जाए? सभी कथाएं भ्रामक हैं। चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति कोई पुरुष से बताया है, तो कोई ब्रह्मा से, कोई प्रजापति को सृष्टा घोषित करता है तो कोई ब्रात्य को इतना ही नहीं एक ही स्रोत के अंतर्गत दी गई व्याख्याएं तक भिन्न हैं, जैसे शुक्ल यजुर्वेद की दो व्याख्याएंः- एक तो उत्पत्ति का स्रोत पुरुष को मानता है और दूसरा प्रजापति को। कृष्ण यजुर्वेद में तीन वर्णन हैं, जिनमें दो के द्वारा प्रजापति को सृष्टा माना गया है, और एक में सृजनकर्ता ब्राह्मण है। यर्थवेद में चार आख्याना हैं। एक में पुरुष को, दूसरे में ब्राह्मण को, तीसरे में ब्रात्य को उत्पत्ति का स्रोत कहा गया है। चौथी व्याख्या तो इन तीनों से ही भिन्न है। इसका सिद्धांत समान होने पर भी विवरण भिन्न है। ब्रह्मा और प्रजापति के स्वरूप के माधयम से दी गई व्याख्याएं एकदम काल्पनिक हैं। मनु या कश्यप के माध्यम से की गई व्याख्याएं मानवीय स्वरूप की हैं।
इनमें की गई परिकल्पनाएं दृषित तो हैं ही इनमें न कोई ऐतिहासिक महत्व है और न कोई सार ही है। प्रोफेसर मैक्समूलर ने अपने कृति प्राचीन संस्कृत साहित्य पृष्ठ 200 पर ब्राह्मण ग्रंथों का विवेचन करते हुए कहा हैःµ
‘‘भारतीय समाज में यह एक उल्लेखनीय दौर रहा है कि ब्राह्मणों ने महत्वपूर्ण स्थिति बना ली थी, परंतु अपने विषय में उसने जो साहित्य रचा निस्संदेह वह बहुत ही अवांछनीय है। कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि इतिहास के उस दौर में आदिम समाज में ही कोई ऐसा साहित्य रचा जा सकता हो जो इतना पांडित्यपूर्ण हो और कालातीत हो। रचनाएं इतनी अनर्गल हैं कि जिनका कोई जोड़ नहीं। उसमें उपहासास्पद विचार भरे पड़े हैं जिनमें सशक्त भाषा और सुविचारित तर्क हैं और विचित्र परंपराएं है। ये विकृत रचनाओं का अंशमात्र है जैसे पीतल या रांग में रत्न जड़ दिए गए हों। यह क्षूद्र साहित्य सामान्यतः अरूचिकर शब्दाडंबर है जिसमें पोंगापंथी, अहंकार और पूरा पांडित्य भरा पड़ा है। इतिहासकारों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि वे यह पता लगाएं कि किसी राष्ट्र का स्वस्थ विकास ऐसी पोंगापथी और अंधविश्वासों के रहते कितनी तीव्रता से हो सकता है। हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि आरंभिक काल में क्या कोई देश ऐसी महामारी से ग्रस्त हो सकता है। ऐसी रचनाओं का उसी प्रकार अध्ययन किया जाना चाहिए जैसे कोई चिकित्सक मंदबुद्धि और मनोरोगियों की दशा का परीक्षण करता है।’’ ख्1,
- मैक्समूलर एंसीएंट संस्कृत लिटरेचर (पाणिनी आफिस संस्करण) पृष्ठ 200