अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 48

अध्याय 3

शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत

शूद्रों की उत्पत्ति के संबंध में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण का विश्लेषण किया जा चुका है। जब हम शूद्रों की नागरिक स्थिति के संबंध में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण को देखते हैं तो पाते है कि उनके विधान में शूद्रों के लिए निर्योग्यताओं के बारे में बहुत लंबी सूची बनाई गई है और उसमें कठोर ताड़ना और दंड की व्यवस्था है।

संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में शूद्रों की निर्योग्यताओं और उनके लिए दंड विधान के निम्नलिखित उदाहरण पाए जाते हैंःµ

  1. कथन संहिता (31.2) और मैत्रयानी संहिता (4.1.3) तथा (1.8.3) के अनुसार

शूद्र को उस गाय का दूध नहीं निकालने देना चाहिए जिसका दूध ‘‘अग्निहोत्र

के उपयोग में लाया जाता है।’’

  1. शतपथ ब्राह्मण (3.1.1.1) मैत्रयानी संहिता (10.1.1.6) तथा पंचविंश ब्राह्मण

(6.1.11) के अनुसार यज्ञ करते समय शूद्र से नहीं बोला जाए तथा यज्ञ के

समय शूद्र उपस्थित न हों।

  1. शतपथ ब्राह्मण (14.1.3) और कथक संहिता (11.10) में आगे कहा हैः-

‘शूद्र को सोमरस का पान करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।’

  1. ऐतरेय ब्राह्मण (6.29.4) और पंचविंश ब्राह्मण (6.1.11) ने तो निम्नतम स्तर

पर पहुंच कर यह कह दिया है कि शूद्र दूसरों का सेवक है। (इसके अतिरिक्त

कुछ नहीं)।

शूद्र के विरुद्ध छोटी सी बदली आगे चल कर तूफान बन कर शूद्रों पर बरसी क्योंकि आपस्तम्ब और बोद्यायन आदि जैसे सूत्रकारों और मनु आदि जैसे स्मृतिकारों द्वारा बनाए विधानों ने शूद्रों के लिए प्रतिबंधों का इतना अम्बार लगाया है जो कल्पनातीत है।

ये निर्योग्यताएं इतनी भयानक हैं कि इन्हें जब तक लिपिबद्ध नहीं किया जाएगा इन पर विश्वास नहीं होगा। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि इनका पूर्ण विवरण यहां देना असंभव है। जिन्हें इनके विषय में जानकारी नहीं है उनके विधान में जो मंत्र बिखरे हैं हम उनके लिए कुछ उद्धरण स्मृतियों और सूत्रों से देंगे।