36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
हो जाता है तो वह अगले जन्म में ग्रामीण सुअर का जन्म धारण कर उसी शूद्र के घर जन्म लेता है, भले ही वह ब्राह्मण जिसका शरीर शूद्र प्रदत्त भोजन से पोषित है प्रतिदिन वेद पाठ करें, अग्नि होम करे या जाप करे। वह कदापि उच्च पद को प्राप्त नहीं कर सकता। शूद्र प्रदत्त भोजन ग्रहण करने पर यदि वह स्वजातीय पत्नी से सहवास कर संतोत्पत्ति करता है तो वह संतान भी उसी की जाति की होगी जिस शूद्र का भोजन ग्रहण किया गया है और स्वर्ण के द्वार उनके लिए बंद मिलेंगे। ख्1,
(घ) मनुस्मृति में व्याख्या हैःµ
ब्राह्मण शूद्र राज्य में निवास न करे और न उस स्थान पर जो दुरात्माओं की बस्तियों से घिरा हो या नास्तिक वेद निदको से प्रभावित हो या जहां चांडाल आदि उधम जातियां निवास करती हों। ख्2,
शूद्र के यहां यज्ञ संपन्न कराने वाले ब्राह्मण को श्राद्ध कर्म में अन्य ब्राह्मणों के साथ भोजन करने के लिए निमंत्रण नहीं देना चाहिए। उसके स्पर्श से भोजन कराने का पूरा लाभ यजमान को नहीं मिलता। ख्3, मृत शूद्र को नगर के दक्षिण, वैश्य को पश्चिमी, क्षत्रिय को उत्तरी तथा ब्राह्मण को पूर्वी द्वार से ले जाएं। ख्4,
तीन
(क) आपस्तंभ धर्म सूत्र में व्याख्या है - ‘‘ब्राह्मण दाहिनी भुजा कान की ऊंचाई तक उठाकर, क्षत्रिय वक्षस्थल की ऊंचाई तक, वैश्य कमर की ऊंचाई तक तथा शूद्र दोनों हाथ नीचे की ओर जोड़कर प्रथम प्रणाम करें।’’ ख्5,
प्रत्युत्तर में प्रथम (तीन) वर्णों से संबंधित मनुष्य को उच्चारण करने वाला अंतिम शब्द तीन अंगुल नीचे भुजा उठाकर अभिवादन करें। ख्6,
यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के घर अतिथि बन कर आए तो ब्राह्मण उससे कुछ काम करा कर तब भोजन दें अन्यथा वह सम्मानित माना जाएगा। अथवा ब्राह्मण का दास राजकीय भंडार से चावल लाकर शूद्र को देकर उसका उपकार करें। ख्7,
(ख) विष्णु स्मृति के अनुसार अतिथि सत्कार करने अथवा वेदयज्ञ या श्राद्ध में उसको (शूद्र को) भोजन कराने का दंड एक सौ पण है। ख्8,
अध्याय 6, श्लोक 27-29
अध्याय 4, मंत्र 61
अध्याय 4, मंत्र 178
अध्याय 5, मंत्र 92
प्रश्न 1, पटल 2, खंड 5, सूत्र 16
प्रश्न 1, पटल 2, खंड 5, सूत्र 17
प्रश्न 8-2, पटल 2, खंड 4, सूत्र 19-20
प्रश्न 5, सूत्र 115