शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत
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(ग) मनुस्मृति का आदेश है - दस वर्ष का ब्राह्मण सौ वर्ष के क्षत्रिय के पितातुल्य होता है। धन, बंधुत्व, अवस्था, कर्म और विद्या ये पांच आदर सूचक स्थान हैं। अंतिम ‘विद्या’ अत्यंत महत्वपूर्ण आदर सूचक है। तीनों स्वर्णों में उपरोक्त पांच गुणों में जिनका जितना अधिक गुण हो वह उतना ही मान्य होता है। किन्तु शूद्र चाहे जितना भी ज्ञानी या धन संपन्न हो वह 90 वर्ष की आयु के पश्चात ही माननीय होता है। इसके पूर्व नहीं। ख्1,
अधिक आयु होने, बाल पकने, अधिक धनी होने या अधिक परिवार बढ़ाने से कोई बड़ा नहीं होता। ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था की है कि वेद वेदांत का ज्ञानी ही सबसे बड़ा होता है।
ज्ञान से ब्राह्मणों की, बल से क्षत्रियों की, धन से वैश्यों की और वायु से शूद्रों की श्रेष्ठता होती है। केवल सिर के बाल पक जाने से कोई वृद्ध नहीं होता। किंतु वेद वेदांग को जानने वाला अल्पायु होते हुए भी वृद्ध के समान होता है, ऐसा देवताओं का कथन है। ख्2,
ब्राह्मण के घर आने वाले क्षत्रिय, वैश्य, मित्र, स्वजन और गुरू अतिथि नहीं कहे जाते। यदि कोई क्षत्रिय अतिथि के रूप में आए तो पहले भोजन करने के बाद ही ब्राह्मण उसे भोजन दें। यदि वैश्य या शूद्र ब्राह्मण के अतिथि के रूप में आएं तो उन्हें सेवकों के साथ दया भाव प्रदर्शित करते हुए भोजन दें। ख्3,
चार
(क) आपस्तम्ब धर्म सूत्र के अनुसारः-
क्षत्रिय के हत्यारे को एक हजार गायें, वैश्य के हत्यारे को सौ गायें तथा शूद्र के हत्यारे को दस गायें ब्राह्मण को दान कर प्रायश्चित करना होगा। ख्4,
(ख) गोतम धर्म सूत्र के अनुसारःµ
क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण को अपशब्द कहने पर एक सौ कांस्यपण, आघात करने पर उससे दुगुना अर्थ दंड है। ब्राह्मण को अपशब्द कहने पर वैश्य को क्षत्रिय से डेढ़ गुना दंड देना होगा। इसके विपरीत ब्राह्मण क्षत्रिय को अपशब्द कहे तो वह आर्धा अर्थात पचास कांस्यपर्ण देगा। इसी प्रकार वैश्य को अपशब्द कहने पर ब्राह्मण क्षत्रिय के मामले की अपेक्षा पच्चीस कांस्यपर्ण देगा। किंतु यदि शूद्र को अपशब्द कहे तो वह कुछ भी दंड न देगा। ख्5,
अध्याय 4, मंत्र 135-137
अध्याय 2, मंत्र 154-156
अध्याय 3, मंत्र 110-112
प्रश्न 1, पटल 9, खंड 24, सूत्र 1-3
अध्याय 12, सूत्र 8-13