40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
वास्तव में धन संचय करने में समर्थ शूद्र धन संग्रह न करे क्योंकि धन प्राप्त कर वह ब्राह्मण को ही सताता है।’’ ख्1,
सात
मनुस्मृति का राजा के लिए परामर्शःµ
‘‘जन्म से ब्राह्मण अथवा स्वयं को ब्राह्मण कहलाने वाला राजा को धर्म अथवा राजनीति सिखा सकता है, शूद्र नहीं। जिस राजा के यहां शूद्र न्यायकर्ता होता है उसका राज्य कीचड़ में धंसी गाय की भांति धरातल को चला जाता है। जिस देश में शूद्र अधिक हों, नास्तिक हों, तथ द्विज न बसते हों वह देश अकाल और रोग से पीडि़त होकर नष्ट हो जाता है।’’ ख्2,
आठ
(क) आपस्तम्ब धर्म सूत्र कहता हैःµ
‘‘धर्म पालन करने वाले तपस्वी तथा ब्राह्मण का चरण धोकर पीने वाले शूद्र, अंधे, गूंगे, बहरे और रोगी (जब तक अशक्त रहें) को कर मुक्त रखा जाए।’’ ख्3,
शूद्र का धर्म है कि तीनों वर्ण की सेवा करे। वह उच्च वर्ण की जितनी अधिक सेवा करेगा उसे उतना ही अधिक पुण्य लाभ होगा। ख्4,
(ख) मनुस्मृति का कथन हैःµ
‘‘महा तेजस्वी (ब्रह्मा) ने विश्व की रक्षा हेतु मुख, बाहु, जंघा और पांव से उत्पन्न होने वाले जीवों का पृथक कर्म निर्धारित किया है। ब्राह्मण के लिए पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ कराना-करना, दान देना- लेना, कर्म निश्चित किए हैं। क्षत्रिय के लिए रक्षा करना, दान देना, यज्ञ कराना, पढ़ना, विषय भोग में आसक्त न होना, कर्म निर्धारित किए हैं। पढ़ना, पशु पालन करना, यज्ञ करना, व्यापार करना, खेती करना और ब्याज पर रुपया देना वैश्यों का कर्म है। शूद्र के लिए उपरोक्त तीनों वर्णों का श्रद्धाभाव से सेवा करना एकमात्र कर्म निश्चित किया है।’’ ख्5,
नौ
(क) आपस्तम्ब धर्म सूत्र कहता हैःµ
‘‘शूद्र स्त्री से द्विज वर्ण का पुरुष व्याभिचार करे तो उसे देश निकाला दिया जाए।
अध्याय 10, मंत्र 129
अध्याय 8, मंत्र 20-22
प्रश्न 2, पटल 10, खंड 26, सूत्र 14-16
प्रश्न 1, पटल 1, खंड 1, सूत्र 7-8
अध्याय 1, मंत्र 87-91