शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत
41
इसके विपरीत यदि शूद्र किसी द्विज स्त्री से व्याभिचार करता है तो वह प्राणदंड का भोगी होता है।’’ ख्1,
(ख) गौतम धर्म सूत्र कहता हैःµ
‘‘यदि शूद्र आर्य स्त्री के साथ संभोग करे तो उसका लिंग काट कर उसकी समस्त संपत्ति छीन ली जाए किन्तु स्त्री का कोई अभिभावक है तो शूद्र का लिंग काट कर उसे प्राणदंड दिया जाए।’’ ख्2,
(ग) मनुस्मृति का आदेश हैःµ
‘‘उच्चतम वर्ण की कन्या के साथ सहवास करने वाला शूद्र प्राण दंड के योग्य है।’’ ख्3,
समान वर्ण की महिला के साथ सहवास करने वाला कन्या के पिता को धन से संतुष्ट कर विवाह कर लें।
जो शूद्र अभिभावक विहीन द्विज स्त्री के साथ व्याभिचार करे, राजा उसका लिंग कटवा कर सर्वस्व हरण कर ले, किन्तु अभिभावक से रक्षित स्त्री के साथ व्याभिचार करे तो सर्वस्व हरण के साथ प्राणदंड दें। ख्4,
द्विज जातियों को अपनी जाति की कन्या से विवाह करना श्रेष्ठ है।
शूद्र पुरुष केवल शूद्र से, वैश्य पुरुष वैश्य एवं शूद्र से, क्षत्रिय पुरुष क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या से विवाह कर सकते हैं। किन्तु ब्राह्मणों को चारों वर्णों की कन्याओं से विवाह करने का अधिकार है।
ब्राह्मण और क्षत्रिय स्वर्ण स्त्री न मिलने पर भी शूद्र को पत्नी बनाने का किसी भी इतिहास में आदेश नहीं पाया जाता है। जो द्विज मोहवश शूद्र कन्या से विवाह करते हैं वे संतान सहित अपने वंश को शीघ्र शूद्र बना देते हैं।’’ ख्5,
ब्राह्मण शूद्र स्त्री के साथ सहवास करने से अधोगति (नरक) को प्राप्त करता है और उससे पुत्र उत्पन्न कर ब्राह्मण पद से भी रहित हो जाता है। विवाहित शूद्र पत्नी के हाथ के बनाया हुआ हव्य देवता, पितर और अतिथि ग्रहण नहीं करते और शूद्र ऐसे आतिथ्य से स्वर्ग भी नहीं जा पाता। जो द्विज शूद्र स्त्री का अधरपान करता है और उसके श्वास से अपने प्राण वायु को दूषित कर उससे जो संतान उत्पन्न करता है उसकी मुक्ति का कोई उपाय नहीं है।’’ ख्6,
प्रश्न 2, पटल 10, खंड 27, सूत्र 8-9
अध्याय 12, सूत्र 2-3
अध्याय 8, मंत्र 366
अध्याय 8, मंत्र 374
अध्याय 3, मंत्र 12-15
अध्याय 3, मंत्र 17-19