अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 57

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

दस

(क) वशिष्ट धर्म सूत्र का कहना हैःµ

‘‘द्वेष भाव, ईर्ष्या रखना, असत्य भाषण, ब्राह्मण निंदा, चुगलखोरी और निर्दयता शूद्र के लक्षण हैं।’’ ख्1,

(ख) विष्णु स्मृति का कथन हैःµ

‘‘ब्राह्मण का नाम मंगलकारी, क्षत्रिय का बलशाली, वैश्य का धन संपन्न शाली और शूद्र का घृणा सूचक रखा जाए।’’ ख्2,

(ग) गौतम धर्म सूत्र कहता हैःµ

‘‘शून्द्र चौथे वर्ण का है और उसका एक ही जन्म होता है। उसका धर्म तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना है। उनकी सेवा द्वारा जीविकोपार्जन करता है। वह उनके उतारे हुए जूते पहने और जूठन खाए। किसी द्विज को अपमानजनक गाली देने व मुक्का मारने पर शूद्र का वह अंग काट दिया जाए। बैठने, सोने, वार्तालाप करने या सड़क पर चलने पर द्विज की बराबरी करे तो दंड दिया जाए।’’ ख्3,

(घ) मनुस्मृति भी उसका अनुसरण करती हैःµ

‘‘किंतु यदि जो ब्राह्मण लोभ या प्रभुत्व से उपनयनधारी द्विजातियों से उनकी इच्छा के विरूद्ध दास का काम ले तो उसे राजा छः सौ पण दंड दें। शूद्र ब्राह्मण द्वारा खरीदा हुआ हो या न हो, उससे नौकर का काम ले, क्योंकि ब्रह्मा ने उसे ब्राह्मण की सेवा के लिए ही बनाया है। स्वामी के द्वारा स्वतंत्र किए जाने पर भी शूद्र दास वृत्ति से छुटकारा नहीं पा सकता क्योंकि वह दासता उसकी नियति है उसे कोई नहीं मिटा सकता।’’ ख्4,

‘‘केवल ब्राह्मणों की और यशस्वी गृहस्थों की सेवा करना ही शूद्र को स्वर्ग देने वाला परमधर्म है। ख्5, यत्न और वाणी से पवित्र रहने वाला श्रेष्ठ जातियों की सेवा करने वाला, मधुर भाषा, अहंकार रहित, उनके आश्रित रहने वाला शूद्र अपने में उत्कृष्ट जाति (दूसरे जन्म में) को प्राप्त करता है।’’ ख्6,

ब्राह्मण की सेवा से शूद्र का जीवन निर्वाह न होता हो तो क्षत्रिय की सेवा करे और इससे भी निर्वाह न होता हो तो वैश्य की सेवा करे। वह स्वर्ग की प्राप्ति हेतु या दोनों (स्वार्थ और परमार्थ) हेतु ब्राह्मणों की सेवा करें।

  1. अध्याय 6, मंत्र 24

  2. अध्याय 27, सूत्र 6-9

  3. अध्याय 10, सूत्र 50, 56-59 तथा अध्याय 12, सूत्र 1, 7

  4. अध्याय 8, मंत्र 412-414

  5. अध्याय 10, मंत्र 128

  6. अध्याय 9, मंत्र 334-335