शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत
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ब्राह्मण की सेवा करना शूद्र की प्रसिद्धि के लिए कृतकृत्यता है। ब्राह्मण की सेवा करना शूद्र का विशिष्ट कर्म कहा गया है। इस कार्य से भिन्न वह जो भी कार्य करता है उसके लिए निष्फल होता है।
उस शूद्र की सेवारत शक्ति, कार्य कुशलता और भृत्यों का परिग्रह (परिवार के पोषण का व्यय) देखकर ब्राह्मण अपने परिवार से यथार्थ प्रयत्न करे। उस शूद्र को जूठा अन्न, पुराना वस्त्र हीन धान्य, जीर्ण ओढ़ना और बिछौना देना चाहिए। ख्1,
ब्राह्मण का मंगल सूचक, क्षत्रिय का बल सूचक, वैश्य का धन सूचक तथा शूद्र का निंदा सूचक नाम रखना चाहिए।
शर्मान्त ब्राह्मण का, क्षत्रियों का सभा से युक्त, वैश्य का पुष्टि से युक्त और शूद्र का दास से युक्त नाम रखना चाहिए। ख्2,
शूद्र यदि द्विज को कटु वचन कहे तो उसकी जबान छेद देनी चाहिए क्योंकि उसकी उत्पत्ति पापमय स्थान से है।
शूद्र यदि द्रोहवश द्विजातियों का नाम और जाति का नाम लेकर बुरी बात कहे तो दस अंगुल की जलती हुई लोहे की सलाख उसके मुंह में डाल देनी चाहिए। यदि वह अंहकारवश किसी ब्राह्मण को धर्म का उपदेश करे तो राजा उसके मुंह और कान में
खौलता हुआ तेल डलवा दें। ख्3,
अंत्यज अपने जिस अंग से द्विज पर आघात करे उसका वहीं अंग काटना चाहिए। यह मनु का आदेश है।
यदि वह द्विज को मारने के लिए हाथ या लाठी उठाए हो तो उसका हाथ और क्रोध से ब्राह्मण को लात मारे तो उसका पैर कटवा देना चाहिए।
जो नीच वर्ण वाला ब्राह्मण आदि के साथ आसन पर बैठने का साहस करे तो राजा उसकी कम को दाग कर उसे देश से निकाले अथवा उसके नितम्ब का मांस कतरवा दे।
राजा ब्राह्मण के ऊपर अहंकार वश थूकने वाले शूद्र के दोनों होंठ, पेशाब करने वाले का लिंग और अपान वायु छोड़ने वाले का मल द्वार (गुदा) कटवा दे। जो शूद्र अविचार से ब्राह्मण का केश, पैर, दाढ़ी, गर्दन या अंडकोश पकड़े तो बिना विचार किए राजा उसके दोनों हाथ कटवा दे।
अध्याय 10, मंत्र 121-125
अध्याय 2, मंत्र 31-32
अध्याय 8, मंत्र 270-72