अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 59

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

जो अपने ही स्वजाति वाले की चमड़ी काटे, लहू निकाल दे तो उसे एक सौ पण दंड दे। मांस काटने वाले को 6 निष्क दंड दे और हड्डी तोड़ने वालों को देश से निकाल दें। ख्1,

(ड.) नारद स्मृति कहती हैःµ

शूद्र जिस द्विज पर मिथ्यारोप लगाता है तो राजा के अधिकारी उसकी जबान के टुकड़े-टुकड़े काट कर उसे फांसी पर लटका दे।

एक जन्म वाला व्यक्ति अर्थात शूद्र यदि द्विज का द्वेष वश अपमान करे तो नीच जाति में जन्म लेने के कारण उसकी जबान काट दी जाए। किसी व्यक्ति का नाम घृणा से ले तो दस अंगुल की सलाख गर्म कर उसकी जीभ में छेद दी जाए।

यदि किसी ब्राह्मण को यह धृष्टतापूर्वक धर्मोपदेश दे तो राजा उसके मुंह और कान में गर्म तेल डलवा दे। शूद्र का जो अंग ब्राह्मण को दुख देता हो तो वह अंग काट दिया जाए। नीच जाति का पुरुष यदि अपने से ऊंची जाति के समकक्ष आसन ग्रहण करे तो उसकी कमर दाग कर निष्कासित कर दें, या (राजा) उसके नितंब को गहराई से कटवा दे। जो उदंडतापूर्वक अपने से ऊंची जाति वाले के ऊपर वह थूक दे तो राजा उसके दोनों होंठ व पेशाब कर दे तो लिंग, अपान वायु छोड़ दे तो चूतड़ कटवा दे। ख्2,

III

शूद्र के विरुद्ध ब्राह्मणों ने जो विधान बनाए उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैःµ

  1. शूद्रों को सामाजिक वर्ण व्यवस्था में अंतिम स्थान पर रखा गया।

  2. शूद्र अपवित्र है अतः कोई पवित्र कर्म ऐसे स्थान पर नहीं किया जाए जहां

वह उस अनुष्ठान को देख सके या सुन सके।

  1. अन्य वर्णों की भांति शूद्र का सम्मान न किया जाए।

  2. शूद्र का जीवन व्यर्थ है। उसका वध कोई बिना दंड दिए कर सकता है और

यदि कुछ देना भी पड़े तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की अपेक्षा बहुत कम।

  1. शूद्र को ज्ञान प्राप्त नहीं करना चाहिए। यह पाप है और उसको ज्ञान देना

दंडनीय अपराध है।

  1. शूद्र को कोई संपत्ति नहीं रखनी चाहिए। ब्राह्मण जब चाहे उसकी संपत्ति को

छीन सकता है।

  1. अध्याय 8, मंत्र 279-284

  2. अध्याय 15, मंत्र 22-27