शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत
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राज्य में शूद्र को कोई पद नहीं दिया जा सकता।
शूद्र का धर्म अपने से ऊंचे वर्णों की सेवा करना है। इसी से उसे मुक्ति
मिलेगी।
- उच्च वर्ण वाला शूद्र से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता। वे शूद्र
स्त्रियों को सहवास हेतु रख सकते हैं, किन्तु यदि शूद्र उच्च वर्ण की किसी
स्त्री का स्पर्श भी कर दे तो उसे कठोर दंड दिया जाए।
- शूद्र जन्म से दास है और सर्वदा दास बना कर रखा जाए।
उपरोक्त संक्षिप्त वर्णन से दो तथ्य प्रकट होते हैं। ब्राह्मणवादी विधान निर्माताओं ने स्वरचित विधानों का शिकार केवल शूद्र को ही बनाया है। यह जानकर और अधिक आश्चर्य होगा कि भारत-आर्य समुदाय में प्राचीन ब्राह्मणवादी साहित्य के अनुसार वैश्य अधिक दलित था न कि शूद्र। ऐतरेय ब्राह्मण में इस संबंध में विवरण प्राप्त होता है। इसमें राजा विश्वमित्र तथा श्यापर्ण ब्राह्मण की कथा है जिसमें कहा गया है कि पवित्र सोमरस पाने के सभी वर्ण अधिकारी है। वैश्यों के विषय में इसमें कहा गया है।
‘‘अब यदि (पुरोहित) दही लाता है तो वैश्य का एक घूंट (शराब का एक घूंट) है, उससे वैश्य को संतुष्ट करो। वैश्य की भांति आपकी श्रेणी में एक पैदा होगा, जो दूसरों को कर देते हैं अथवा जो दूसरों द्वारा प्रयोग किया (खाया) जाता है और जिसे जब चाहे सताया जा सकता है।’’ ख्1,
प्रश्न यह है कि वैश्य को क्यों छोड़ दिया गया और सारी मार शूद्रों के ऊपर ही क्यों पड़ी?
ब्राह्मणों को विशेषाधिकार प्राप्त होने से शूद्र के निकटतम वैश्य वर्ण भी प्रभावित हुए। शूद्र तीनों वर्णों के नीचे हैं और उन्हें बहिष्कृत किया हुआ है। ऊपरी तौर पर देखने से ऐसा लगता है कि तीनों वर्णों को शूद्रों का शोषण करने का अधिकार है। लेकिन तथ्य क्या है? वास्तविकता यह है कि क्षत्रिय और वैश्य शूद्र के विरुद्ध आवाज उठाने के भी अधिकारी नहीं है। तीनों वर्णों की अपेक्षा ब्राह्मण को विशेषाधिकार प्राप्त हैं। उदाहरणार्थ शूद्र यदि कोई अपराध करता है तो ब्राह्मण को क्षत्रिय और वैश्य की अपेक्षा शूद्र को अधिक दंड दिलाने का अधिकार है ब्राह्मण अपनी आवश्यकतानुसार बिना किसी अपराध बोध के शूद्र की संपत्ति का हरण कर सकता है। शूद्र को संपत्ति नहीं रखनी चाहिए क्योंकि इससे ब्राह्मण को दुख होता है। ब्राह्मण को शूद्र राजा के राज्य में नहीं रहना चाहिए। यह क्यों है? क्या कारण है कि ब्राह्मण शूद्र से विद्वेषपूर्ण व्यवहार करते हैं?
इसके अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार आवश्यक है। क्या सामान्य ब्राह्मण शूद्रों के निषेध के बारे में सोचता है? उनके विचार असाधारण और प्राकृतिक
- म्यूर खंड 1, पृष्ठ 436, 40, 42