अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 61

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

रूप से निंदनीय है, यह सभी स्वीकार करेंगे। क्या ब्राह्मण भी इसे स्वीकार करेंगे? यदि प्रतिबंधों की सूची उनके ऊपर कोई प्रभाव न डाले तो यह अस्वाभाविक नहीं। प्रथम बात यह है कि चिरंतन प्रकृति और मानसिकता ने उन्हें इतना कुंठित कर दिया है कि शूद्रों पर लागू निषेधों के कारण और निवारण के संबंध में ब्राह्मणों ने विचार करने की जरूरत नहीं समझी। दूसरी बात यह है कि उनमें से जो कुछ विचारवान है, वे भी यह कह कर इस बात को टाल देते हैं कि अन्य देशों में भी इसी प्रकार के प्रतिबंध विद्यमान हैं। अतः यह कोई असामान्य या लज्जाजनक स्थिति नहीं है। दूसरे प्रकार के इन विचारों की विवेचना आवश्यक है।

दूसरा मत सरल और ग्राहय है और प्रतिष्ठा देने और रूढ़ीगत आस्थाओं को सुधारने में सहायक है, फिर भी किसी बात को वैसे ही छोड़ना ठीक नहीं है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये प्रतिबंध विश्व भर में अद्वितीय हैं। ब्राह्मणवादी विधान की विश्व के किसी विधान से बराबरी करना असंभव है। इसकी रोमन विधान से ही तुलना करें।

IV

यह बेहतर रहेगा कि हम रोमन साम्राज्य की व्यवस्था और वहां के शोषित समाज के साथ यहां की सामाजिक व्यवस्था की तुलना करें। रोम के विधान में समाज की पांच श्रेणियां थी। (1) कुलीन और साधारण (2) स्वतंत्र (फ्रीमेन) और दास (3) नागरिक और विदेशी (4) स्वाधीन और पराधीन (5) ईसाई और विधर्मी (पेगन)।

रोम के विधान के अनुसार (1) कुलीन (2) स्वतंत्र (फ्रीमेन) (3) नागरिक (4) स्वाधीन और (5) ईसाई संपन्न वर्ग थे। इसके अतिरिक्त शोषित वर्ग मेंं (1) साधारण, (2) दास (3) विदेशी (4) पराधीन और (5) अधर्मी थे।

रोमन के अनुसार स्वाधीन लोगों को नागरिक अधिकार के साथ ही राजनैतिक अधिकार भी प्राप्त थे। नागरिक अधिकारों में वैधानिक वैवाहिक (कानुबियम) और संपन्न वाणिज्यिक (कौमरसियम) नामक अधिकार थे। इनमें प्रथम के अनुसार वैधानिक रूप से विवाह संपन्न कर नागरिक अधिकार प्राप्त कर सकता था। यह विशेष पैतृक अधिकार था जिसके अनुसार बिना वसीयत के पैतृक संपत्ति पर भी अधिकार हो जाता है। इसलिए इसकी अत्यंत आवश्यकता होती थी। विशिष्टि रोमन विधान के अनुसार संपदा अथवा कोमर्सियम के अनुसार किसी भी संपत्ति के क्रय-विक्रय का अधिकार प्राप्त होता था। राजनैतिक अधिकार के अनुसार जन प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट देने और किसी पद पर नियुक्ति प्राप्त करने का अधिकार मिलता था जिन्हें रोमन साम्राज्य में ‘‘जुस सफ्रागी’’ तथा ‘‘जुस ऑनोरम’’ कहा जाता था। स्वतंत्र (फ्रमेन) और दास में इतना ही अंतर था कि दासों को कोई नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। उनके अधिकार उनके स्वामी की इच्छा पर निर्भर थे।