अध्याय 3. शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत - Page 62

शूद्रों की स्थिति के बारे में ब्राह्मणवादी सिद्धांत

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विदेशियों का जो ‘‘परेग्राइन’’ कहे जाते थे, किसी प्रकार का नागरिक या राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और जब तक किसी नागरिक का संरक्षण मिलता तब तक उन्हें सुरक्षा का भी अधिकार नहीं था।

स्वाधीन और पराधीन में अंतर यह था कि प्रथम को अधिकार के लिए अन्य किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था जबकि दूसरे इस संबंध में पराया मुंह ताकते थे। (1) ‘‘पोटेस्टास’’ (2) मानुस (3) मेंसीपियम यद्यपि सब का प्रभाव एक-सा था, पोटेस्टास में रोमन विधान के अनुसार दो वर्ग हो गए। पोटेस्टास के अंतर्गत (1) दास (2) बच्चे (3) पलि मानुस (4) अदालत द्वारा ऋणदाता को ऋण लेने वाला निश्चित करना (5) किराए पर लिए गए तलवारबाज आते थे। पोटेस्टास पराधीन सा रहता था। उसे अपने स्वयं अधिकारों का उपयोग न कर दूसरे का संरक्षण लेना होता था।

पराधीन को पोटेस्टास के कारण निषेधों का शिकार होना पड़ता था और (1) वे स्वाधीन नहीं थे, (2) वे संपत्ति प्राप्त नहीं कर सकते थे (3) वे आघात या चोट पहुंचाए जाने पर स्वयं विरोध नहीं कर सकते थे।

ईसाई धर्म के प्रसार के साथ ही पैमानों पर निषेधाज्ञाएं लागू की गई। प्रारंभ में जब रोम के सभी निवासी एक प्रकार की आराधना करते थे तब उनके नागरिक अधिकारों में धर्म का दखल नहीं था। ईसाई सम्राटों के राज्य में नास्तिक, धर्मान्तरित तथा विधर्मी (मूर्तिपूजक) और यहूदी सभी भिन्न-भिन्न प्रकार से निषिद्ध हुए, विशेष रूप से संपत्ति के अधिग्रहण तथा न्यायालय में साक्ष्य के मामले में। केवल चार सदस्यीय परिषद द्वारा मान्य रूढि़वादी ईसाई ही नागरिक अधिकारों का उपयोग कर सकते थे।

रोमन विधान में प्रतिबंधों का विवरण जानबूझ कर हिंदू नाक ऊंची कर के दिखा सकते हैं कि केवल ब्राह्मणवादी विधान में ही कुछ निश्चित वर्गों पर प्रतिबंध लागू नहीं है, बल्कि रोमन विधान में ब्राह्मणवादी विधान के बराबर क्रूरता बिल्कुल नहीं थी। रोमन और ब्राह्मणवादी विधानों की तुलना करने पर और निषेधों की व्याख्या करने पर ब्राह्मणवादी विधान के आधार पर कलई खुल जाती है।

रोमन विधान में निषेध और अधिकार का आधार क्या था? रोमन विधान का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रोमन विधानों के आधार ‘‘कापूत’’ और ‘‘एक्जिस्टीमाशियों’’ थे।

‘‘कापूत’’ का अर्थ है व्यक्ति की नागरिक हैसियत। इस स्थिति में मुख्यतः तीन बातें आती थी। - (1) स्वाधीनता, (2) नागरिकता और (3) परिवार। स्वाधीनता अधिकार प्राप्त स्वतंत्र व्यक्ति कहे जाते थे। यह अधिकार दासों को नहीं मिलते थे। यदि स्वतंत्र व्यक्ति रोम का नागरिक होता था तो उसे नागरिक अधिकार भी खुद बखुद प्राप्त हो जाते थे। उसे केवल राजनैतिक अधिकार ही नहीं मिल जाते थे बल्कि उसे नागरिक विभाग का भी अधिकार हो जाता था। अंततः उसे पारिवारिक विधानों के अंतर्गत सभी सुविधाएं प्राप्त हो जाती थीं।