48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
जब भी कभी विद्यमान हैसियत समाप्त या संशोधित हो जाती थीं तब व्यक्ति ‘‘कैपिटिस डिमिन्युशिओं’’ की स्थिति में आ जाता था जिसका अभिप्रायः है उसकी पूर्व मान्य स्थिति पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती थी या कुछ कम हो जाती थी। इस स्थिति में तीन प्रकार के परिवर्तन होते थे जिन्हें सर्वाधिक मध्यम और न्यूनतम कहते थे। सर्वाधिक में स्वाधीनता, नागरिकता और दाम्पत्य के अधिकार समाप्त हो जाते थे। ऐसा उस स्थिति में होता था जब रोम का नागरिक युद्धबंदी हो जाता था या आपराधिक मामले में दास बना दिया जाता था, किंतु शत्रु से मुक्त होकर आने पर उसे समस्त नागरिक अधिकार फिर प्राप्त हो जाते थे।
स्थिति में परिवर्तन की दूसरी रीति व्यक्तिगत आजादी के अधिग्रहण के अतिरिक्त नागरिक और पारिवारिक अधिकारों की समाप्ति थी। पर ऐसा तब किया जाता था जब कोई नागरिक किसी अन्य प्रांत की नागरिकता प्राप्त कर लेता था। ऐसी स्थिति में उसे अग्नि और जल के प्रयोग से रोक दिया जाता था, ताकि वह रोमन साम्राज्य के क्षेत्र से बाहर निकल जाए अथवा साम्राज्य के ही किसी अन्य प्रांत में चले जाने की सजा दे दी जाती थी।
जब कोई व्यक्ति अपनी स्वाधीनता और नागरिकता से वंचित हुए बिना किसी परिवार विशेष का सदस्य नहीं रह जाता था, उसे कम से कम प्रांत छोड़ने के लिए कह दिया जाता था, उदाहरणार्थ जब एक स्वतंत्र नागरिक जबरदस्ती किसी अन्य के अधिकार में पहुंच जाता था या किसी का गुलाम बने बालक की उसकी दास्ता से उसका पिता उसे वैधानिक रूप से मुक्त करा लेता था।
नागरिकता मूल रूप से जन्म से प्राप्त होती थी। वैधानिक रूप से विवाह के बाद उत्पन्न संतान पिता की स्थिति पर पहुंच कर नागरिक बन जाती थी, बशर्ते कि पिता भी पुत्रोत्पत्ति के समय वैधानिक रह हो। यदि नागरिकता प्राप्त न हो तो संतति को माता की स्थिति मिलती थी। ऐसी परिस्थिति में उत्पन्न होने पर दास भी नागरिकता प्राप्त कर लेता था। यह नियम ‘‘इलियासेन्टिया’’ और ‘‘जूनिया नोरबाना’’ विद्वानों द्वारा संशोधित किए गए। इसके अनुसार कुछ निश्चित मामलों में मुक्त व्यक्ति केवल विदेशी का दर्जा पा सकता था। अन्य संशोधनों के लागू होने पर प्रत्येक दास लगातार मताधिकार और नागरिकता पाता रहा। नागरिकता के अधिकार संपूर्ण जाति या किसी व्यक्ति विशेष को जनता या संसद द्वारा वार्षिक समारोह के अवसर पर या सम्राट द्वारा राजतिलक के अवसर पर आयोजित समारोह में दिए जाते थे। यह सब वैसा ही था जिसे आजकल स्वाभाविकरण कहते हैं।
रोमन विधान में किसी व्यक्ति की स्थिति ऐसी हो सकती थी और नहीं भी, जिसका अभिप्रायः होता था कि नागरिकता के अधिकार के साथ ही राजनैतिक अधिकार अर्थात