50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
यह निर्विवाद है कि अधिकार और निषेध समान रूप से सबके ऊपर लागू नहीं किए जाते थे। सब का आधार वर्ण था। ब्राह्मणवादी विधान का सैद्धांतिक आधार समस्त अधिकार प्रथम तीन वर्णों को और समस्त निषेध शूद्रों के लिए थे। ब्राह्मणवादी विधान के शीर्षस्त समर्थक कह सकते थे कि रोमन विधान भी हमारे विधान की भांति वर्ग पर आधारित था। इस पर विचार किया जा सकता है जहां तक कुलीन और सामान्य जन का संबंध है अधिकारों और निषेधों का वर्ग विभाजन था। इस संबंध में निम्न विवरण विचारणीय हैःµ
सर्वप्रथम यह उल्लेखनीय है कि जन सामान्य निम्न वर्ग के माने जाते थे। किन्तु वे दास नहीं थे, स्वाधीन थे और उन्हें ‘‘जूस कामर्सी’’ के अधिकार प्राप्त थे जिसके अनुसार वे अपनी संपत्ति का क्रय विक्रय कर सकते थे। उनके ऊपर केवल राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों की पाबंदी थी। दूसरी बात यह है कि उन पर लागू ये प्रतिबंध स्थायी नहीं थे। उन्हें दो प्रकार के सामाजिक प्रतिबंधों को झेलना पड़ता था। एक था उनमें और कुलीन वर्ग के मध्य अंतर्जातीय विवाह। यह प्रतिबंध बहुत पहले से था जिसे बारह जजों ने वैधानिक रूप दे दिया था। ख्1, सन् 445 ई. पूर्व कैनलेनियन विधान के द्वारा प्रतिबंध समाप्त कर दोनों वर्गों के मध्य अतंर्जातीय वैवाहिक संबंधों को स्वीकृति मिल गई। निम्न वर्ग के सामान्य जन दूसरे निषेध के द्वारा रोम के मंदिरों में ‘‘पौन्टिफ’’ और ‘‘उगुरूष’’ नामक पद ग्रहण नहीं कर सकते थे। इस संबंध में 300 ई. पूर्व ‘‘ऑगुनियन’’ विधान के लागू होने पर यह प्रतिबंध भी समाप्त हो गया।
जहां तक असेम्बली के लिए वोट के अधिकार का संबंध है रोम के छठे सम्राट के काल में ‘‘सरवियस टूलियस’’ संविधान के लागू होने पर यह अधिकार भी उन्हें प्राप्त हो गया। राजनैतिक प्रतिबंधों के अनुसार वे प्रशासनिक या सार्वजनिक पद पर नियुक्त नहीं किए जा सकते थे। सन् 509 ई. पूर्व में गणराज्य की स्थापना के साथ ही यह निषेध भी नहीं रहा। इस संबंध में ‘‘प्लेबियस ट्रिब्यून’’ की नियुक्ति 494 ई. पूर्व हुई और औपचारिक रूप से 412 ई. पूर्व उनके लिए कोषाध्यक्ष पद मिलने लगा। वास्तविक रूप से 367 ई. पूर्व कानसुलशिप ‘‘मजिस्ट्रेट पद, 366 ई. पूर्व कुरूलेडिलेशिप’’, 356 ई. पूर्व तानाशाही 251 ई. पूर्व सेंसरशिप (आलोचक) और 336 ई. पूर्व प्रीएटरशिप (दंडाधिकारी), 351 ई. पूर्व में होटेसियन असेम्बली शुरू होते ही सामान्य जन की महत्वपूर्ण विजय हुई। इस विधान के लागू होते ही समस्त रोम के निवासियों पर लागू विधानों में एकरूपता आ गई और ऊंच नीच के भेदभाव लगभग समाप्त हो गए। इस प्रकार सामान्य और कुलीन वर्ग समान श्रेणी में आकर राजनैतिक अधिकारों का समान उपभोग करने लगे।
जन सामान्य को कुलीन के समान केवल सामाजिक स्थिति और राजनैतिक अधिकार में
- यह व्यवस्था 12 जजों के आदेश से बहुत पुरानी थी। जिन्होंने तो केवल इसे मान्यता दी।